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Thursday, 27 July 2023

मणिपुर हिंसा

                                            

  "अफीम" एक अत्यधिक नशे की लत वाली मादक दवा को संदर्भित करता है जो अफीम पोस्ता के सूखे लेटेक्स से प्राप्त होती है। (Papaver somniferum). अफीम में मॉर्फिन और कोडीन सहित विभिन्न एल्कलॉइड होते हैं, जिनमें शक्तिशाली दर्द निवारक और शामक प्रभाव होते हैं। इसका उपयोग सदियों से औषधीय और मनोरंजन दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है।


मॉर्फिन, अफीम के प्राथमिक घटकों में से एक, एक शक्तिशाली दर्दनाशक है और गंभीर दर्द को प्रबंधित करने के लिए चिकित्सा सेटिंग्स में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। हालाँकि, इसमें दुर्व्यवहार और लत की उच्च संभावना भी है। कोडीन, अफीम में पाया जाने वाला एक अन्य क्षारीय पदार्थ, मॉर्फिन की तुलना में कम शक्तिशाली है, लेकिन फिर भी इसका उपयोग दर्द निवारक और खांसी दबाने वाले के रूप में किया जाता है।


पूरे इतिहास में अफीम और उसके व्युत्पन्न पदार्थों का समाजों और संस्कृतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। 19वीं शताब्दी में, चीन और पश्चिमी शक्तियों, विशेष रूप से ब्रिटेन के बीच अफीम के युद्ध अफीम के व्यापार को लेकर लड़े गए थे। अफीम की लत के नकारात्मक सामाजिक और स्वास्थ्य परिणामों ने इसके उपयोग को नियंत्रित करने और वैकल्पिक दर्द प्रबंधन दवाओं के विकास के प्रयासों को प्रेरित किया।


आज, अफीम में पाए जाने वाले कई शक्तिशाली यौगिक, जैसे कि मॉर्फिन और कोडीन, का उपयोग विभिन्न दर्द दवाओं के आधार के रूप में किया जाता है, दोनों अपने प्राकृतिक रूप में और संश्लेषित रूपों में। दुरुपयोग और लत की संभावना के कारण इन दवाओं को सख्ती से नियंत्रित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, चिकित्सा उद्देश्यों के लिए इन पदार्थों के उपयोग और दुरुपयोग और निर्भरता के जोखिमों के साथ उनके लाभों को संतुलित करने की आवश्यकता के बारे में चर्चा चल रही है।

मणिपुर में अफीम की खेती भी मुख्य कारण।

 मणिपुर में बसी एक विदेशी मूल की जाति कुकी है, जो मात्र डेढ़ सौ वर्ष पहले पहाड़ों में आ कर बसी थी। ये मूलतः मंगोल नश्ल के लोग हैं। जब अंग्रेजों ने चीन में अफीम की खेती को बढ़ावा दिया तो उसके कुछ दशक बाद अंग्रेजों ने ही इन मंगोलों को वर्मा के पहाड़ी इलाके से ला कर मणिपुर में अफीम की खेती में लगाया। आपको आश्चर्य होगा कि तमाम कानूनों को धत्ता बता कर ये अब भी अफीम की खेती करते हैं और कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इनके व्यवहार में अब भी वही मंगोली क्रूरता है, और व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध का भाव है। मतलब नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे।


    अधिकांश कुकी यहाँ अंग्रेजों द्वारा बसाए गए हैं, पर कुछ उसके पहले ही रहते थे। उन्हें वर्मा से बुला कर मैतेई राजाओं ने बसाया था। क्यों? क्योंकि तब ये सस्ते सैनिक हुआ करते थे। सस्ते मजदूर के चक्कर में अपना नाश कर लेना कोई नई बीमारी नहीं है। आप भी ढूंढते हैं न सस्ते मजदूर? खैर...

    आप मणिपुर के लोकल न्यूज को पढ़ने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि कुकी अब भी अवैध तरीके से वर्मा से आ कर मणिपुर के सीमावर्ती जिलों में बस रहे हैं। सरकार इस घुसपैठ को रोकने का प्रयास कर रही है, पर पूर्णतः सफल नहीं है।

    आजादी के बाद जब उत्तर पूर्व में मिशनरियों को खुली छूट मिली तो उन्होंने इनका धर्म परिवर्तन कराया और अब लगभग सारे कुकी ईसाई हैं। और यही कारण है कि इनके मुद्दे पर एशिया-यूरोप सब एक सुर में बोलने लगते हैं।

     इन लोगों का एक विशेष गुण है। नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे। क्या सरकार, क्या सुप्रीम कोर्ट? अपुनिच सरकार है! "पुष्पा राज, झुकेगा नहीं साला" 


     सरकार कहती है, अफीम की खेती अवैध है। ये कहते हैं, "तो क्या हुआ? हम करेंगे।" कोर्ट ने कहा, "मैतेई भी अनुसूचित जाति के लोग हैं।" ये कहते हैं, "कोर्ट कौन? हम कहते हैं कि वे अनुसूचित नहीं हैं, मतलब नहीं हैं। हमीं कोर्ट हैं। 

 


  मैती, मैतेई या मैतई... ये मणिपुर के मूल निवासी हैं। सदैव वनवासियों की तरह प्राकृतिक वैष्णव जीवन जीने वाले लोग। पुराने दिनों में सत्ता इनकी थी, इन्हीं में से राजा हुआ करते थे। अब राज्य नहीं है, जमीन भी नहीं है। मणिपुर की जनसंख्या में ये आधे से अधिक हैं, पर भूमि इनके पास दस प्रतिशत के आसपास है। उधर कुकीयों की जनसंख्या 30% है, पर जमीन 90% है।

     90% जमीन पर कब्जा रखने वाले कुकीयों की मांग है कि 10% जमीन वाले मैतेई लोगों को जनजाति का दर्जा न दिया जाय। वे लोग विकसित हैं, सम्पन्न हैं। यदि उनको यदि अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया तो हमारा विकास नहीं होगा। हमलोग शोषित हैं, कुपोषित हैं...   कितनी अच्छी बात है न?


     अब मैतेई भाई बहनों की दशा देखिये। जनसंख्या इनकी अधिक है, विधायक इनके अधिक हैं, सरकार इनके समर्थन की है। पर कोर्ट से आदेश मिलने के बाद भी ये अपना हक नहीं ले पा रहे हैं। क्यों? इसका उत्तर समझना बहुत कठिन नहीं है।

     

Monday, 17 January 2022

मैं हु उत्तर प्रदेश

मैं हूँ उत्तर प्रदेश l नाम तो मेरा सुना ही होगा l देश की उत्तर दिशा में बसता हूँ मैं l मेरे पूर्व में बिहारझारखण्ड, पश्चिम में हरियाणा और दिल्ली, उत्तर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तथा दक्षिण में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य हैं l  की सबसे अधिक जनसँख्या (लगभग २५ करोड़) वाला राज्य मैं ही हूँ l यही वजह है कि यहाँ होने वाले घटनाक्रमों का सीधा असर दिल्ली तक होता है
यह मेरा सौभाग्य है कि प्रकृति ने मुझे भरपूर प्रेम और ममता प्रदान की l उत्तराखंड से निकलने वाली गंगा, यमुना, रामगंगा  मेरी धरा को अपने अमृत से सींचते हुए, मैदानों को उपजाऊ बनाती हैं l घाघरा, चम्बल, बेतवा, सोन, गंडक, सरयू नदियों से सिंचित  क्षेत्रों में भरपूर अन्न का उत्पादन होता है l चावल, मक्का, गेंहूं, मटर, सरसों के साथ गन्ना सबसे अधिक पैदा होने वाली फसल है l 
मेरे अंदर ७५ जिले बसते हैं, जिसमें लखीमपुर सबसे बड़ा जिला है l मेरी पुरानी पहचान “अवध” को अब तक संभाले हुए है मेरा दिल यानी लखनऊ, जो मेरी राजधानी भी है l गंगा- जमुनी संस्कृति की धरोहर को समेटे यह शहर कला और शिल्प का नायाब उदाहरण है l भूलभुलैया, रूमी दरवाजा, घंटाघर, इमामबाड़ा मुग़ल स्थापत्य कला के आकर्षक नमूने हैं तो ,आगरा का ताजमहल इस कला का सिरमौर , जिसने विश्व भर को सम्मोहित कर रखा है l गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन का साक्षी है प्रयागराज, जहाँ स्नान करने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं और संगम में डुबकी लगा कर तृप्त हो जाते हैं l 
यदि मैं वाराणसी का जिक्र न करूं तो बात अधूरी रह जाएगी l सारनाथ, काशी विश्वनाथ मंदिर और प्रसिद्ध गंगा घाट लोगों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं l और अब तो मेरे अस्तित्व को प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है l यह सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, अपितु पूरे देश के लिए सम्मानित कदम है l ऐसे ही मथुरा, वृन्दावन,, दुधवा टाइगर रिज़र्व …….अनगिनत स्थान हैं जिन्होंने मेरी साख बढ़ाई है l 

मेरे यहाँ बनने वाले पकवानों का स्वाद तो विश्व भर में लोगो की जुबान पर है l चाहे वह लखनऊ के टुंडे के कबाब हो, मलीहाबाद के दशहरी आम, प्रयागराज की गरमागरम जलेबी- रबड़ी, बलिया का लिट्टी चोखा, मथुरा के पेड़े, आगरा का पेठा, बटोही के रसगुल्लों के साथ मेरी गुझिया, रसमलाई, कुल्फी, खीर और बनारसी पान तो लाजवाब है l मेरे व्यंजनों ने तो सबको चटखारे लेने पर मजबूर कर दिया है l 

 अपने यहाँ की कलाओं के बारे में मैं क्या कहूं, हर कोई इनका मुरीद है l 
मेरे यहाँ विकसित हुई चिकनकारी ने तो पूरी दुनिया में मेरी शान बढ़ाई है l मलमल के कपड़ों पर रंगीन धागों के महीन जाल में सभी बंध कर रह गए हैं l 
किसी भी नवयौवना के विवाह की तैयारी बनारस की बनारसी साड़ियों के बगैर पूरी नहीं होती है तो फिरोजाबाद की रंग बिरंगी कांच की चूड़ियां अनगिनत कलाईयों पर सजती हैं l मुरादाबाद के पीतल के बर्तन, खुर्जा के मिटटी के बर्तन लोगों की पहली पसंद हैं तो भदोही और मिर्ज़ापुर के खूबसूरत कालीन की जादुई दुनिया से भला कौन बच सका है l 

  मेरे रग रग में बसी है कला l कत्थक, रसिया, चारकुला और ब्रज रासलीला ने जगह जगह मेरी संस्कृति का रंग बिखराया है l उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, बिरजू महाराज, चंदू महाराज, तीजनबाई ….न जाने कितने ही कलाकारों ने विदेशों तक मेरे नाम की धूम मचाई है l मुंशी प्रेमचंद, कबीरदास , तुलसी दास, सूरदास, जय शंकर प्रसाद,महादेवी वर्मा , मैथिली शरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन, भारतेंदु हरिश्चंद जैसे प्रकांड साहित्यकारों ने राज्य भाषा हिंदी को अपनी लेखनी से उन्नति के चरम शिखर तक पहुँचाया है l इंदिरा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर आज़ाद, अमिताभ बच्चन सहित बहुत सारी हस्तियों ने अपनी कुशल प्रतिभा से मेरी गरिमा में चार चाँद लगाया है lयहाँ पर पंडित मोतीलाल नेहरु, पंडित जवाहर लाल नेहरु, पुरषोत्तम दास टंडन, लाल बहादुर शास्त्री, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, राजीव गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रतिष्ठित राजनेताओं ने देश की राजनीति में महतवपूर्ण भूमिका निभायी l यही वजह है की दिल्ली तक पहुँचने का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है l यही मेरा परिचय है l 
 मुझे और भी बेहतर तरीके से जानने के लिए प्रतिदिन मेरे साथ जुड़े रहें, मेरे इस ब्लॉग को लाइक और फॉलो करते रहेंl



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