Saturday, 19 June 2021
वसंत के वज्रनाद की वापसी
Sunday, 13 June 2021
लाल इतिहास की फसल-1
उन घटनाओं से जो आपके जन्म से पहले घटित हो चुकी
हैं, उनसे अनभिज्ञ बने रहना एक शिशु बने रहना जैसा है
- सिसेरो
1967 की मई की एक गर्मी भरी सुबह पश्चिम बंगाल के अनजान से एक गांव में खेत के पास झाड़ियों में छुप कर बैठे कुछ पुरुषों और महिलाओं को चंद मिनटों के अंदर ही इसका एहसास होने वाला था ।500 वर्ग किलोमीटर में फैला पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी का इलाका तीन पुलिस थानों के अधीन था- नक्सलबाड़ी, खारीबाड़ी और फांसीदेवा। नक्सलबाड़ी का क्षेत्र नेपाल और पूर्वी पाकिस्तान ( बांग्लादेश) से लगा हुआ था। और यहां की आबादी में ज्यादातर आदिवासी थे जो संथाल, ओरावं, मुंडा और राजवंशी समुदायों से आते थे। इनमें से अधिकांश भूमिहीन मजदूर थे। जो जमींदारों के स्वामित्व वाली जमीन पर ठेके पर काम करते थे यह कोई शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं था। जमींदार इसके एवज में फसल का बहुत बड़ा हिस्सा खुद लेता ।इन खेतों में जानवरों की तरह खटने वाले आदिवासियों को इतना भी नहीं मिलता की वे दो जून की रोटी खा सकें।फसल के बंटवारे को लेकर आए दिन विवाद होते रहते थे।
1960 के दशक के मध्य में भारत गंभीर खाद्य संकट के दौर से गुजर रहा था। खाद्यान्न की कमी से लाखों लोग प्रभावित हुए थे। अनेक भूखमरी के शिकार हो गए सरकार ने हमेशा की तरह यह मानने से इनकार किया कि आजाद भारत में खाने की कमी से किसी की मौत हुई हालात जब बदतर होते चले गए तो दिल्ली में बैठे नौकरशाहों ने इन मौतों की वजह कुपोषण को बताया ।74 वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद नई दिल्ली कि सरकार का वही पुराना रवैया आज भी कायम है जब भी उड़ीसा या राजस्थान जैसे माओवाद से अछूते क्षेत्र से भी भूख से मौत की खबर आती है तो अधिकारियों की सारी कवायद यह साबित करने के लिए शुरू हो जाती है कि ये मौतें भूख से नहीं बल्कि हैजा, पेचिश के कारण हुए। ना तो यह जानते हैं और ना मानना चाहते हैं कि इन बीमारियों से मौत के शिकार वे ही लोग होते हैं जिनके शरीर खाना ना मिलने से बुरी तरह कमजोर हो गए हैं। चंद्रमा पर मिशन भेजने केेे अभियान से लेकर परमाणु संपन्नन राष्ट्र होने का दम भरने वाला भारत आज तक यह सुनिश्चिित नहीं कर सका है कि कोई भी भूखा ना रहे ।ऐसे मामले देखनेे में आए की अनाज बाहर पड़ा सड़ रहा है और सरकार द्वारा संचालित भारतीय खाद्य निगम के गोदाम शराब बनानेे वाली किसी कंपनी को किराए पर दे दिए गए हैं।
बहरहाल, 1960 के दशक में देश की खेती योग्य जमीन पर मुट्ठी भर लोगों का मुख्यतः बड़े जमींदारों का कब्जा था ।उन वर्षों के आसपास जमीन की मिल्कियत से संबंधित एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि गावों में 40% जमीन पर महज 5% परिवारों का कब्जा था इसे भी मोटे तौर पर किया गया अनुमान बताया गया था ।भारत के भूमिहीन गरीबों के लिए जिंदगी लगातार एक चुनौती बनी हुई थी और तो और बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्य अकाल की चपेट में आ गए थे।
खाद्य संकट से निपटने के लिए सरकार ने हरित क्रांति की योजना तैयार की और उसे अमली रूप दियाा। इससे भारत के अनाज उत्पादन में वृद्धि तो हुई लेकिन इस हरित क्रांति में समाज में और भी ज्यादा विषमता पैदा की इससे केवल वही किसान लाभान्वित हो सके जो रासायनिक उर्वरक और आधुनिक कृषि उपकरणों को खरीद सकते थे।
सरकार को यह बात समझने में 2 वर्ष का समय लग गया 1969 में राज्य के मुख्यमंत्री का एक सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ जिसमें तत्कालीन गृह मंत्री वाई बी चह्णवाण ने चेतावनी दी कि अगर हरित क्रांति के साथ सामाजिक न्याय के उपायों को नहीं जोड़ा गया तो हो सकता है कि इसकी हरियाली समाप्त हो जाए।
नक्सलबाड़ी में उस तपती मई की सुबह उन पुरुषों और महिलाओं के झाड़ियों में छुपकर बैठने की घटना से काफी पहले से एक व्यक्ति विकास के इस स्वरूप पर बहुत बारीकी से गौर कर रहा था। जिस घटना मे माओ त्से तुंग केे नेतृत्व मे किसानों की सेना ने पड़ोसीी देेश चीन में संपन्न की थी । यह व्यक्ति माओ के विचारोंं से कहीं बहुत गहरााई तक प्रभावित था। और इसकी पक्की धारणा थी कि लगभग वैसेे स्थीतियां भारत मेंं भी मौजूद है। जिनमें अगर जुझारू किसानो और युवकों को गोलबंद किया जाए तो वह हथियारबंद संघर्ष के जरिए सरकार का तख्ता पलट सकते हैं ।
अपने नायक माओ त्से तुंग की तरह चारू मजूमदार भी यह मानते थे की युद्ध एक रक्तरंजीत राजनीति के अलावा कुछ नहीं है ।वह खास तौर पर माओ के एक उद्धरण का जिक्र करते थे जिसमें कहा गया था कि "क्रांति कोई डिनर पार्टी नहीं है यह कोई लेख लिखना,चित्रकारी करना या कशीदाकारी करना भी नहीं है इसे विनम्रता, आदर पूर्वक और बहुत सज्जनता के साथ आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। क्रांति एक विद्रोह है एक हिंसात्मक कार्यवाही है जिसके जरिए एक वर्ग दूसरे वर्ग का तख्ता पलट देता है
1965 आते-आते उसने जो भी पढ़ा और सोचा था उसके आधार पर उसके विचारों ने आकार लेना शुरू किया और उत्तरी बंगाल के गांव में चारू मजूमदार की विचारधारा से प्रेरणा लेकर युवकों ने प्रचार का कार्य शुरू किया तथा गरीबों और भूमिहीन किसानों को संगठित करने में लग जाए इससे पहले भारत के कम्युनिस्ट पार्टी सी पी आई ने विभाजन हो चुका था और अपेक्षाकृत ज्यादा रेडिकल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने जन्म ले लिया था लेकिन इस सीपीआई (एम)ने भी ऐसे बहुत सारे कामरेड थे जिनका पार्टी की राजनीति से मोहभंग हो चुका था। और जो यह मानते थे कि उनकी पार्टी संशोधन वादी हो चुकी है इन कामरेडो ने चारू मजूमदार से संपर्क किया। उन्होंने कुछ शर्ते रखी और कहा कि जो उनके साथ शामिल होना चाहते हैं उन्हें चार पूर्व शर्तों को मानना पड़ेगा
1- माओ त्से तुंग को विश्व क्रांति के नेता के रूप में स्वीकार किया जाए और उनके विचारों को उस काल के मार्क्सवाद लेनिनवाद का सर्वोच्च रूप माना जाए।
2- इस दृष्टिकोण को स्वीकार किया जाए कि भारत के हर हिस्से में क्रांतिकारी स्थिति मौजूद है।
3- भारतीय क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए इलाका बार सत्ता दखल ही एकमात्र रास्ता है।
4- क्रांति को आगे ले जाने के लिए छापामार युद्ध ही एकमात्र साधन है।
चारू मजूमदार की यह पक्की धारणा थी कि ऐसे भूमिगत संगठनों के निर्माण के जरिए ही क्रांति संपन्न की जा सकती है। जो राज्य के खिलाफ युद्ध की शुरुआत करें और उसे आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करें मजदूर संगठनों या किसान संघ हो जैसे "खुले" संगठनों के प्रति उनका नकारात्मक रवैया था उनके समर्थन में उसी इलाके के दो अन्य प्रमुख नेता थे-कानू सान्याल जिनके अंदर जबरदस्त संगठनात्मक कौशल था और जो इलाके के चाय बागान के मजदूरों में बेहद लोकप्रिय थे तथा जंगल संथाल जो एक लोकप्रिय आदिवासी नेता थे जिन्होंने 1967 के चुनाव में हिस्सा लिया था वह चुनाव नहीं जीत पाए थे लेकिन विजई कांग्रेस का उम्मीदवर के बाद सबसे अधिक वोट पाने वाले वही व्यक्ति थे।
इन नेताओं के समर्थन में सीपीआई(एम) के कुछ कार्यकर्ताओं की मदद लेकर 3 किसानों ने देसी हथियारों को थामा और एक जमीदार के खलिहान से धान की सारी फसल उठा ले गए।
अगले कुछ महीनों के दौरान कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने जबरन खेतों पर कब्जा किया खलीहाॅनो से अनाज उठाया और जमीन से संबंधित कागजात की होली जलाई अगर किसी ने प्रतिरोध किया तो उसके साथ सख्ती से निपटा गया।
जमींदारों ने फौरन कार्यवाही शुरू की और उन किसानों को जो उनके खेतों पर काम करते थे निकाल बाहर किया। कुछ मामलों में जमीदारों नें पुलिस की मदद ली। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसा सिलसिला था जो लगातार जारी रहा। पुलिस ने अधिकांशत: उन्हीं लोगों के पक्ष में काम किया जो प्रभावशाली और संपन्न थे अथवा जो राजनीतिक तौर पर उनके मालिक थे।
कुछ ही दिनों पूर्व खेतों में काम करने के लिए कुछ किसान गए थे शाम होने पर वह घर नहीं लौटे। अगले दिन कुछ और किसान खेतों में गए और वह भी वापस नहीं लौटे। इसीलिए कुछ पुरुषों और महिलाओं ने झाड़ियों में छुपकर यह जानना चाहा कि माजरा क्या है? जैसे ही किसानों के एक अन्य समूह ने खेत जोतना शुरू किया ।पुलिस का एक दस्ता आया और उन्हें पकड़ कर ले गए। पुलिस वालों से जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जमीदार यह नहीं चाहता है कि वह आदमी उसके खेत पर काम करें और उसने इन लोगों को गिरफ्तार करने को कहा है।इसकी वजह से किसानों के अंदर जबरदस्त गुस्सा पैदा हुआ और तब इन्होंने खुद को भूमिगत दस्तों में संगठित किया जैसा कि चारू मजूमदार के समर्थक चाहते थे।
जल्दी ही एक खूनी युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी जिसने नक्सलबाड़ी को भारत के माओवादी आंदोलन का आधार बनाया और इसे एक नाम भी दिया -नक्सल आंदोलन।
23 मई 1967 इंस्पेक्टर सोनम वांग्दी एक पुलिस दल लेकर पहुंचा ताकि आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार किया जा सके। गुस्से से भरे आदिवासियों के साथ मुठभेड़ हुई और इन आदिवासियों ने तीरों से हमला किया एक तीर वांग्दी को भी लगा और उसकी तत्काल मौत हो गई।
इसके 2 दिनों बाद पुलिस की और भी बड़ी टोली पहुची पुलिस का मुकाबला करने के लिए इलाके के पुरुषों और महिलाओं ने अपने को एकजुट किया और जो भी हथियार उन्हें मिला उससे वे पुलिस से भीड़ गए ।मुठभेड़ के दौरान आदिवासियों पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें 9 लोग मारे गए इनमें 6 महिलाएं और 2 बच्चे थे।
अब बाकायदा एक युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी।
सलाम बस्तर
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