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Wednesday, 26 July 2023

सुनील छेत्री : The Footballer

 क्या आप इन्हें जानते हैं ?? विराट कोहली से कम प्रशंसक हैं इस शक़्स के । पर काम ये भी वैसा ही करते हैं अपने देश के लिए , जैसा क्रिकेट के खिलाड़ी करते हैं 



ये हैं हमारे देश के फुटबॉल खिलाड़ी सुनील क्षेत्री नाम तो सुना ही होगा कभी न कभी । 


भले ही भारत का फुटबॉल मैच आप देखते नहीं होंगे पर                                                                                      इनका नाम हर कोई जानता है। 


और बड़ी बात ये है कि दुनिया भर के बड़े फुटबॉलर रोनाल्डो और मेसी जितना गोल दागे हैं, उतना ये भी दाग चुके हैं, पर इनको कम उम्र कम अंतराष्ट्रीय अवसर मिले, कम प्रतिस्पर्धा मिला जिसके वजह से आज बड़े खिलाड़ियों जितना लोकप्रियता नहीं है। 


अभी फिलहाल ही इन्होंने भारत को एक ऐतिहासित जीत दिलाई थी, तब फिर से सुर्खियों में आ गए थे।और लोग भारतीय फुटबॉल को अलग नजरिये से देखने लगे थे। चलिए कुछ खास जानते हैं।



सुनील छेत्री एक भारतीय पेशेवर फुटबॉलर हैं, जो फॉरवर्ड के रूप में खेलते हैं. वह इंडियन सुपर लीग क्लब बेंगलुरु और भारत की राष्ट्रीय टीम  दोनों की कप्तानी करते हैं।


छेत्री सक्रिय खिलाड़ियों में तीसरा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय गोल करने वाला खिलाड़ी है।


 वह भारत के लिए सर्वाधिक कैप्ड खिलाड़ी और सर्वकालिक शीर्ष गोल करने वाले खिलाड़ी भी हैं।


छेत्री ने 2002 में मोहन बागान में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की. बाद में वह जेसीटी में चले गए जहां उन्होंने 48 खेलों में 21 गोल किए. सुनील दिल्ली में आयोजित संतोष ट्रॉफी के 59वें संस्करण में दिल्ली टीम का हिस्सा थे. उन्होंने उस टूर्नामेंट में गुजरात के खिलाफ हैट्रिक समेत 6 गोल दागे थे. क्वार्टर फाइनल में दिल्ली केरल से हार गई और उसने उस मैच में भी गोल किया. उन्होंने 2010 में कैनसस सिटी विजार्ड्स के मेजर लीग सॉकर पक्ष के लिए हस्ताक्षर किए, विदेश जाने वाले नोट के उपमहाद्वीप से तीसरे खिलाड़ी बन गए. वह भारत के आई-लीग में लौटे, जहां उन्होंने चिराग युनाइटेड और मोहन बागान के लिए ,...


छेत्री को उनकी उत्कृष्ट खेल उपलब्धि के लिए 2011 में अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award) मिला, भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, 2019 में पद्मश्री पुरस्कार (Padma Shri), 2021 में, उन्हें भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान, खेल रत्न पुरस्कार (Khel Ratna Award) मिला. यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले फुटबॉलर हैं ।



दिसंबर 2017 को, छेत्री ने अपनी लंबे समय की प्रेमिका सोनम भट्टाचार्य से शादी की, जो पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय और मोहन बागान के खिलाड़ी
सुब्रत भट्टाचार्य
की बेटी हैं (Sunil Chhetri Wife).


Wednesday, 16 June 2021

भारत में अशोक राज

अशोक-राज वस्तुतः भारत का स्वर्ण काल था। इसी काल में प्राचीन भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित हुआ। एक भाषा और लिपि से जबरदस्त राष्ट्रीय एकता कायम हुई। इसी काल में धम्म की धमक  पश्चिमी एशिया,उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व यूरोप से लेकर दक्षिण के राज्यों तक सरसरा कर पहुंच गई थी। राज्य भी अहिंसक हो सकता है ।इसकी मिसाल विश्व इतिहास में अशोक-राज ने साबित कर दिया।
    बुद्ध और अशोक भारत की शांति-संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। अशोक-राज में दोनों प्रतीकों का ऐसा मणिकांचन संयोग हुआ कि भारत का गौरव बाइस सौ साल बाद भी धूमिल नहीं हो सका।

     अशोक और उनका परिवार


विश्व इतिहास में सिकंदर,सीजर,नेपोलियन जैसे विजेता हुए मगर किसी को इतिहास में वह स्थान प्राप्त नहीं है ।जो सम्राााट अशोक को प्राप्त है एक ऐसा सम्राट जिन्होंने तलवार का त्याग विजित होने पर नहीं बल्कि विजेता होने पर किया।एच जी वेल्स ने लिखा कि इतिहास में वर्णित हजारों राजाओं और महाराजाओं के बीच देवानंपीय अशोक का नाम एक चमकदार नक्षत्र केे अनुरूप अकेला चमक रहा है। वोल्गा से लेकर जापान तक आज भी उनका नाम  आदर के साथ लिया जाता है। चीन, तिब्बत तथा भारत भी उनके बड़प्पन का बखान करते हैं। प्रणय आलिंगन
अशोक के जमाने में वर्ण-व्यवस्था नहीं थी तब गण-व्यवस्था थी मगर इतिहासकार अशोक को कभी छत्रिय तो कभी शुद्र बताए जाने की खोज में लगे रहते हैं। और निरर्थक इतिहास के पन्ने खर्च करते हैं।जो वर्ण व्यवस्था सम्राट अशोक के समय में नहीं थी उसे खोजने की कोशिश जातिवादी मानसिकता का द्योतक है तब गण व्यवस्था थी और अशोक मौरीय गण से आते थे।मगर इतिहासकार पुराणों को आधार बनाकर उन्हें शुद्र बनाने पर तुले हुए हैं।
सम्राट अशोक की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। कि उनके जीवन की दास्तान संस्कृत,पाली,तिब्बती,चीनी,बर्मी,सिंहल,थाई,लाओ और खेतानी जैसे अनेक भाषा ग्रंथ अपने-अपने ढंग से सुनाते हैं। कोई उनकी मां का नाम सुभद्गरागीं तो कोई धम्मा बताता हैै। उसी प्रकार अशोक की पत्नी का नाम अलग-अलग ग्रथों में अलग-अलग मिलताा है। मगर अशोक की रानी के अभिलेख मेंं उनकी उनकी पत्नी का नाम कालूवाकी मिलता हैै जो तिवल की मां थी। हमारेे यहां तिष्यरक्षिता को लेकर अनेक साहित्य रचे गए ।लेकिन कालूवाकी को लेकर साहित्य में कोई हलचल नहींं है।जबकी कालूवाकी का ही पुरातात्विक सबूत हमारे पास है चूूूँँकि कालूवाकी नाम आर्यमुलक नहींं हैै। इसकी सजा कालूवाकी को साहित्य बाहर कर दी गई।
अशोक के अभिलेखों से अशोक के परिवार के कुछ है सदस्यों का पता चलता है श्रीलंका के एक मामूली स्तूप के एक मामूली पत्थर पर जो अम्पारा जिले के राजगला में स्थित है । इसका प्रमाण मिला है कि महिंद्र थेर श्री लंका गए थे धम्म लिपि और सिंहली भाषा ने लिखा है कि यह स्तूप ईदीका थेर और महींद्र थेर का है, जो इस भूमि के उज्जवल भविष्य के लिए यहां आए थे।
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में पानगुरारिया बौद्ध विहार है पानगुरारिया में दो शिलालेख और एक यष्टी लेख पर अशोक की बेटी संघमित्रा द्वारा दान दिए जाने का विवरण अंकित है।जिससे संघमित्रा के पुरातात्विक ऐतिहासिकता पुष्ट होती है।
सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी। नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तीय से ब्याही गई थी।पति-पत्नी दोनों बुधमार्गी थे ।काठमांडू से सटे चाबहील में चारुवति का स्तूूप है।
अशोक का पहली बार रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मौर्य मिलता है। जूनागढ़ अभिलेख दूसरी सदी का है।जूनागढ़ अभिलेख में लिखा है कि सुदर्शन तालाब मौर्य नरेश चंद्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने बनवाया था अशोक मौर्य के लिए यवनराज तुषास्प ने उसे बड़ी बड़ी नालियों से युक्त किया ।पुराणों में अशोक का नाम अशोक वर्धन मिलता है जो बाद में लिखे गए हैं।अशोक के खुद के शिलालेखों(मास्की गुर्जरा नेत्तूर और उड़ेगोलम)ने उनका नाम अशोक लिखा मिलता है।

राजगद्दी पर बैठने के बाद अशोक ने सिर्फ एक युद्ध किए जो कलिंग युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार है ।अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने आज से कोई ढाई हजार साल पहले पश्चिमोत्तर भारत की उस वैज्ञानिक सीमाओं को प्राप्त कर लिए थे जिस को छूने के लिए आधुनिक काल में अंग्रेज व्यर्थ की आहें भरते रहे। बिंदुसार न्यू इस महान साम्राज्य को बचाए रखा अशोक ने उसे और विस्तार दिया अशोक ने 14 में शिलालेख में स्वयं कहाा है कि मेरा साम्राज्य विस्तृत है अशोक के साम्राज्य की सीमाएं कहां से कहां तक विस्तृत थी इसका पता हमें विभिन्न स्थानों से प्राप्त उनके ही अभिलेखों से पता चलता है दूसरे किसी सबूत की जरूरत नही है ।अशोक का साम्राज्य उत्ततर पश्चिम में हिंदूकुश से पूरब में बंगाल तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में मैसूर तक विस्तृत था कलिंग और सौराष्ट्र पर भी उनका अधििकार था।प्राचीन भारत का कोई सम्राट इतने विस्तृत भूखंड का स्वामी नहीं था।
जिस दार्शनिक और दर्शन की खोज में सम्राट अशोक के पिता यूनान तक अपनी आंखें गड़ाए हुए थे। अशोक की आंखों ने वह दार्शनिक और दर्शन यही भारत में ही खोज निकाले ।उन्होंने गंगा घाटी के धम्म को उठाकर विश्वधम्म का रूप दे डाले। लेनिन ने राजनीति में मार्क्स के सिद्धांतों को लागू किए और अशोक ने राजनीति में बुद्ध के सिद्धांतों को लागू किये और इस सिद्धांत पर चलकर वे दुनिया में वह मुकाम हासिल किए जो कम ही सम्राटों को नसीब हुए सच में अशोक दी ग्रेट साम्राज्य विस्तार के सैनिक-सम्राट थे तो युद्ध की विभीषिका के से आहत संवेदनशील और दुखी मनुष्य भी थेे।
रमेश चंद्र मजूमदार ने लिखा है कि साम्राज्य तो उठते गिरते रहे हैं लेकिन अशोक के माध्यम से भारत के नैतिक विजय को जो गौरव प्राप्त हुआ है उसकी दीप्ति 2000 साल से अधिक समय बीत जाने पर भी धुंधली नहीं हुई है।

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