अशोक-राज वस्तुतः भारत का स्वर्ण काल था। इसी काल में प्राचीन भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित हुआ। एक
भाषा और
लिपि से जबरदस्त राष्ट्रीय एकता कायम हुई। इसी काल में
धम्म की
धमक पश्चिमी एशिया,उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व यूरोप से लेकर दक्षिण के राज्यों तक सरसरा कर पहुंच गई थी। राज्य भी अहिंसक हो सकता है ।इसकी मिसाल विश्व इतिहास में अशोक-राज ने साबित कर दिया।
बुद्ध और अशोक भारत की शांति-संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। अशोक-राज में दोनों प्रतीकों का ऐसा मणिकांचन संयोग हुआ कि भारत का गौरव बाइस सौ साल बाद भी धूमिल नहीं हो सका।
अशोक और उनका परिवार
विश्व
इतिहास
में
सिकंदर,सीजर,
नेपोलियन जैसे विजेता हुए मगर किसी को इतिहास में वह स्थान प्राप्त नहीं है ।जो
सम्राााट अशोक को प्राप्त है एक ऐसा सम्राट जिन्होंने तलवार का त्याग
विजित होने पर नहीं बल्कि
विजेता होने पर किया।
एच जी वेल्स ने लिखा कि इतिहास में वर्णित हजारों राजाओं और महाराजाओं के बीच
देवानंपीय अशोक का नाम एक चमकदार नक्षत्र केे अनुरूप अकेला चमक रहा है।
वोल्गा से लेकर
जापान तक आज भी उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है।
चीन, तिब्बत तथा
भारत भी उनके बड़प्पन का बखान करते हैं।
प्रणय आलिंगनअशोक के जमाने में वर्ण-व्यवस्था नहीं थी तब गण-व्यवस्था थी मगर इतिहासकार अशोक को कभी छत्रिय तो कभी शुद्र बताए जाने की खोज में लगे रहते हैं। और निरर्थक इतिहास के पन्ने खर्च करते हैं।जो वर्ण व्यवस्था सम्राट अशोक के समय में नहीं थी उसे खोजने की कोशिश जातिवादी मानसिकता का द्योतक है तब गण व्यवस्था थी और अशोक मौरीय गण से आते थे।मगर इतिहासकार पुराणों को आधार बनाकर उन्हें शुद्र बनाने पर तुले हुए हैं।
सम्राट अशोक की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। कि उनके जीवन की दास्तान संस्कृत,पाली,तिब्बती,चीनी,बर्मी,सिंहल,थाई,लाओ और खेतानी जैसे अनेक भाषा ग्रंथ अपने-अपने ढंग से सुनाते हैं। कोई उनकी मां का नाम सुभद्गरागीं तो कोई धम्मा बताता हैै। उसी प्रकार अशोक की पत्नी का नाम अलग-अलग ग्रथों में अलग-अलग मिलताा है। मगर अशोक की रानी के अभिलेख मेंं उनकी उनकी पत्नी का नाम कालूवाकी मिलता हैै जो तिवल की मां थी। हमारेे यहां तिष्यरक्षिता को लेकर अनेक साहित्य रचे गए ।लेकिन कालूवाकी को लेकर साहित्य में कोई हलचल नहींं है।जबकी कालूवाकी का ही पुरातात्विक सबूत हमारे पास है चूूूँँकि कालूवाकी नाम आर्यमुलक नहींं हैै। इसकी सजा कालूवाकी को साहित्य बाहर कर दी गई।
अशोक के अभिलेखों से अशोक के परिवार के कुछ है सदस्यों का पता चलता है श्रीलंका के एक मामूली स्तूप के एक मामूली पत्थर पर जो अम्पारा जिले के राजगला में स्थित है । इसका प्रमाण मिला है कि महिंद्र थेर श्री लंका गए थे धम्म लिपि और सिंहली भाषा ने लिखा है कि यह स्तूप ईदीका थेर और महींद्र थेर का है, जो इस भूमि के उज्जवल भविष्य के लिए यहां आए थे।
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में पानगुरारिया बौद्ध विहार है पानगुरारिया में दो शिलालेख और एक यष्टी लेख पर अशोक की बेटी संघमित्रा द्वारा दान दिए जाने का विवरण अंकित है।जिससे संघमित्रा के पुरातात्विक ऐतिहासिकता पुष्ट होती है।
सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी। नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तीय से ब्याही गई थी।पति-पत्नी दोनों बुधमार्गी थे ।काठमांडू से सटे चाबहील में चारुवति का स्तूूप है।
अशोक का पहली बार रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मौर्य मिलता है। जूनागढ़ अभिलेख दूसरी सदी का है।जूनागढ़ अभिलेख में लिखा है कि सुदर्शन तालाब मौर्य नरेश चंद्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने बनवाया था अशोक मौर्य के लिए यवनराज तुषास्प ने उसे बड़ी बड़ी नालियों से युक्त किया ।पुराणों में अशोक का नाम अशोक वर्धन मिलता है जो बाद में लिखे गए हैं।अशोक के खुद के शिलालेखों(मास्की गुर्जरा नेत्तूर और उड़ेगोलम)ने उनका नाम अशोक लिखा मिलता है।
राजगद्दी पर बैठने के बाद अशोक ने सिर्फ एक युद्ध किए जो कलिंग युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार है ।अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने आज से कोई ढाई हजार साल पहले पश्चिमोत्तर भारत की उस वैज्ञानिक सीमाओं को प्राप्त कर लिए थे जिस को छूने के लिए आधुनिक काल में अंग्रेज व्यर्थ की आहें भरते रहे। बिंदुसार न्यू इस महान साम्राज्य को बचाए रखा अशोक ने उसे और विस्तार दिया अशोक ने 14 में शिलालेख में स्वयं कहाा है कि मेरा साम्राज्य विस्तृत है अशोक के साम्राज्य की सीमाएं कहां से कहां तक विस्तृत थी इसका पता हमें विभिन्न स्थानों से प्राप्त उनके ही अभिलेखों से पता चलता है दूसरे किसी सबूत की जरूरत नही है ।अशोक का साम्राज्य उत्ततर पश्चिम में हिंदूकुश से पूरब में बंगाल तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में मैसूर तक विस्तृत था कलिंग और सौराष्ट्र पर भी उनका अधििकार था।प्राचीन भारत का कोई सम्राट इतने विस्तृत भूखंड का स्वामी नहीं था।
जिस दार्शनिक और दर्शन की खोज में सम्राट अशोक के पिता यूनान तक अपनी आंखें गड़ाए हुए थे। अशोक की आंखों ने वह दार्शनिक और दर्शन यही भारत में ही खोज निकाले ।उन्होंने गंगा घाटी के धम्म को उठाकर विश्वधम्म का रूप दे डाले। लेनिन ने राजनीति में मार्क्स के सिद्धांतों को लागू किए और अशोक ने राजनीति में बुद्ध के सिद्धांतों को लागू किये और इस सिद्धांत पर चलकर वे दुनिया में वह मुकाम हासिल किए जो कम ही सम्राटों को नसीब हुए सच में अशोक दी ग्रेट साम्राज्य विस्तार के सैनिक-सम्राट थे तो युद्ध की विभीषिका के से आहत संवेदनशील और दुखी मनुष्य भी थेे।
रमेश चंद्र मजूमदार ने लिखा है कि साम्राज्य तो उठते गिरते रहे हैं लेकिन अशोक के माध्यम से भारत के नैतिक विजय को जो गौरव प्राप्त हुआ है उसकी दीप्ति 2000 साल से अधिक समय बीत जाने पर भी धुंधली नहीं हुई है।