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Sunday, 13 June 2021

मुझे चाहिए लाल

6 अप्रैल 2010 को मध्य भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के जवानों का एक समूह इलाके में गश्त लगाने के बाद लौट रहा था। उस सुबह एकदम तड़के माओवादियों के एक बड़े दस्ते ने इन जवानों पर हमला बोल दिया।माओवादियों ने छोटे-छोटे समूहों में बैठकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। सैनिकों ने जवाबी हमले किए लेकिन माओवादियों के आगे उनकी चल नहीं सकी देखते-देखते साथ चल रहे स्थानीय पुलिसकर्मी सहित सीआरपीएफ के 75 जवान मारे गए कुछ ही घंटों के अंदर मुठभेड़ की तस्वीरें जो सबसे पहले स्थानीय टेलीविजन चैनल पर दिखाई गई, राष्ट्रीय स्तर पर भी  सभी चैनलों पर दिखाई जा रही थीं।
     जब से यह देश आजाद हुआ उस समय से लेकर अब तक किसी राज्य में विद्रोहियों द्वारा इतने बड़े पैमाने पर किए गए हमले की यह पहली घटना थी कश्मीर में 2 दशकों से आतंकवाद है जिसे एक पड़ोसी देश की भी मदद प्राप्त है। तो भी अकेले किसी एक हमले में वहां भी इतने सुरक्षाकर्मी नहीं मारे गए थेे। माओवादी विद्रोह अपनी उग्रता और क्षमता की वजह से अखबारों की सुर्खियां बनने के मामले में कश्मीर और उत्तर पर्वी राज्यों से आगे निकल चुका थाा।
 अब से कुछ साल पहले तक खबरों की दुनिया से माओवादियों का अस्तित्व गायब था। खबरो मे कश्मीर की ही खूब बिक्री होती थीी। लेकिन अब भारत का हृदय स्थल ही नया कश्मीर बन गया था कुछ ही समय केे भीतर माओवादी विद्रोह लगातार मजबूत ‌‌होता गया और अब इसका विस्तार लगभग आधेेे भारत को अपनेेे दायरे में लेे चुका था छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश।
 माओवादी नेता अब हर जगह थे
पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में एक वरिष्ठ माओवादी नेता मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी लगभग एक मिथक बन चुके थे।
 प्रायः टेलीविजन के पर्दे पर उनकी वह तस्वीर दिख जाती है।जिसमें कैमरे की तरफ उनकी पीठ होती है और कंधे से एक के 56 राइफल लटकती रहती है। अपनेे व्यवहार से वह किसी खतरनाक विद्रोही की बजाय कोई अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर ज्यादा लगते हैं वह धीमी आवाज मेें बोलते हैं और बेहद सामान्य व्यक्ति लगते हैं।
लेकिन, पश्चिम बंगाल में राज्य के खिलाफ आदिवासियों के सशस्त्र विद्रोह  कि उन्होंने महीनों तक व्यक्तिगत तौर पर निगरानी की और एक समय ऐसा भी आया जब पश्चिमी मिदानपुर का समूचाा लालगढ़ इलाका "मुक्त क्षेत्र " के रूप में तब्दील हो गया जहां राज्य का कोई प्राधिकार नहीं था ।और माओवादी ही वहां एक तरह से सरकार चला रहे थे स्थानीय स्थानों पर लाल विद्रोहियोंं का कब्जा हो गया था जिन्होंने सत्तारूढ़ सीपीएम सरकार के कार्यकर्ताओं की क्रूरता से हत्या की।

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