पीपुल्स डेली ने लिखा दार्जिलिंग क्षेत्र के क्रांतिकारी किसानों ने विद्रोह कर दिया है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक क्रांतिकारी समूह के नेतृत्व में ग्रामीण क्रांतिकारी ससस्त्र संघर्ष के एक लाल क्षेत्र की स्थापना भारत में हो गई है। भारतीय जनता के क्रांतिकारी संघर्ष के लिए यह घटना जबरदस्त महत्व रखतीी है।
लेकिन देश के अंदर चारू मजूमदार की इन कार्यवाही ने सीपीएम नेतृत्व को बुरी तरह नाराज कर दिया। पार्टी की बैठकों में उन्हें मानसिक तौर पर बीमार बताया गयाा। और यहां तक कहा गया कि वह एक पुलिस एजेंट है। कुछ नहीं यह कहा कि वह नई दिल्ली के इशारे पर काम कर रहे हैं ताकि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार को अस्थिर किया जा सके। कुछ ने उन्हें अमेरिकी एजेंट कहा लेकिन इन आलोचनाओं से तनिक भी विचलित हुए बिना कम्युनिस्टों का यह नक्सलबाड़ी ग्रुप माओ द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप अपना काम करता रहाा।
1968 के मध्य में कानू सान्याल,जंगल संथाल तथा एक अन्य कामरेड सुरेंद्र बोस अपने दो अन्य साथियों के साथ चीन की यात्रा पर गए ताकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से सैनीक और राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
1969 में लेनिन के जन्म दिवस के अवसर पर चारू मजूमदार ने एक नई कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का एलान किया भाकपा( मार्क्सवादी-लेनीनवादी) या सीपीआई (एमएल)।
इसी बीच इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सेना भेजने का फैसला किया ताकि समस्या का सैन्य समाधान ढूंढा जाए। सेना,अर्धसैनिक बलों और पश्चिम बंगाल बिहार तथा उड़ीसा राज्य के पुलिस बलों की मदद से संयुक्त रूप से एक अभियान छेड़ा गया जिसे ऑपरेशन स्टिपल चेज नाम दिया गया।
अगले 72 दिनों के भीतर नक्सलबाड़ी विद्रोह पर काबू पा लिया गया था ।अधिकांश छापामार नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन चारू मजूमदार गिरफ्तारी से बचे रहे।
चारू मजूमदार ने महसूस किया कि नक्सलबाड़ी में आंदोलन विफल हो गया ।अब उन्होंने एक नए इलाके की तलाश शुरू की जहां से क्रांति को आगे बढ़ाया जा सके और सत्ता संघर्ष जारी रह सके। इस मकसद के लिए नक्सलबाड़ी के क्रांतिकारियों ने मिदानपुर का इलाका चुना उन दिनों मिदानपुर भारत का सबसे बड़ा जिला था और यह औद्योगिक तथा रेलवे के प्रमुख केंद्र खड़गपुर के बगल में स्थित था। अंग्रेजों के जमाने में भी यह क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जाना जाता था। युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस भी 1889 में वही पैदा हुए थे।जिन्हें एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट की हत्या के असफल प्रयास के जुर्म में 19 वर्ष की आयु में फांसी पर लटका दिया गया था। मृत्युदंड पाने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों मे उन्हें शुमार किया जाता है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन भले ही विफल हो गया हो लेकिन इसने युवकों की एक समूची पीढ़ी को प्रेरणा दे और क्रांतिकारी राजनीति की शुरुआत की दरअसल के दशक का उतरार्ध्द सारी दुनिया ने युवकों के आंदोलन वाला दौर था ।चीन में सांस्कृतिक क्रांति की तैयारी चल रही थी ।अमेरिका वियतनाम ने बुरी तरह गिरा हुआ था ।कोलकाता की सड़कों पर बेचैन और क्षुब्द्ध युवक पुलिस की गाड़ियों पर देसी बम फेंक रहे थे। समृद्ध परिवार के छात्र अपने प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़कर और एक शानदार कैरियर को तिलांजलि देकर बिहार तथा अन्य इलाकों के जंगलों की ओर रवाना हो रहे थे ताकि क्रांति में हिस्सा ले सकें। भारत में ऐसे युवकों के लिए नक्सलबाड़ी ने एक जगमगाती रोशनी का काम किया।
सामंतवाद सबसे बड़ा कारण है जिसमें नक्सलवाद के शुरू होने में भूमिका निभाई।
नक्सल विचारक और कवि वरवरा राव ने अपनी जेल डायरी में एक बड़े सामंत विश्नुुरु रूप देशमुख के खेतों में काम करने वाली मजदूर महिलाओं की पीड़ा का जबरदस्त वर्णन किया है।एक बार की घटना है जब उन महिलाओं ने उस से विनती की की अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए वह उन्हें थोड़ी देर के लिए खेत से बाहर जाने दे।बताया जाता है कि उसने मिट्टी का एक घड़ा मंगवाया और उन औरतों से कहा कि वे उस घड़े में अपने स्तन से दूध निकालकर भरे।इसके बाद उसने उन औरतों के हाथ से घड़ा छीन लिया और दूध अपने खेत में बिखेर दिया।
1948 के मध्य तक तेलंगाना क्षेत्र का लगभग 1/6 हिस्सा कम्युनिस्ट छापामारो के नियंत्रण में आ गया था 1948 में भारतीय राज्य ने अपनी सेना को निजाम से निबटने और उसे सत्ता से हटाने के लिए भेजा।हैदराबाद को भारतीय संघ का एक हिस्सा बना लिया गया। इस संकुचित हो गए मुक्त क्षेत्र का अब और ज्यादा विस्तार नहीं किया जा सकता था। लिहाजा छापामारो को गोदावरी नदी, करीमनगर तथा नालगोंडा के जंगलों में जाकर शरण लेनी पड़ी। गोदावरी के वन क्षेत्र में भूमिहीन लोग मुख्य रूप से कोया आदिवासी समुदाय से हैं ।और इन्होंने छापामार संगठनो को अपना लिया जिसका आगे चलकर उन्हें उस समय जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा। जब कम्युनिस्टों के खिलाफ हेराल्ड ब्रिग्स की योजना की तर्ज पर सेना ने अभियान चलाया। हेराल्ड ब्रिग्स 1950 के दशक में तत्कालीन मलय में कम्युनिस्टों के खिलाफ अभियान चलाने वाले ब्रिटिश डायरेक्टर थेे।
सीपीआई मे 1964 में उस समय औपचारिक तौर पर विभाजन हुआ।जब सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने के पक्षधर लोगों ने सीपीआई (एम)नाम से एक अलग पार्टी का गठन कर लिया। चारू मजूमदार जैसे लोग इस में शामिल हुए। जो बाद में इसकी नीतियों से असंतुष्ट हो गए जैसा कि पहले बताया गया है।
श्रीकाकुलम में भी उसी वर्ष गड़बड़ी पैदा हुई जिस वर्ष नक्सलबाड़ी की घटना हुई थी।
1950 के दशक में कुछ कम्युनिस्ट अध्यापकों ने सावरा और जटापु आदिवासियों के बीच काम शुरू किया। इनमें प्रमुख थे वेपंटापू सत्यनारायण जो एक करिश्माई नेता थेे। आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए उन्होंने दो शादियां की एक सावरा में और दूसरी जटापू समुदाय में। वेपंटापू सत्यनारायण के साथ थे आदिबटला कैलासम इन्हें( सत्यम-कैलासम) नाम से ही लोगों के बीच बुलाया जाता था और इन दोनों ने मिलकर गिरिजन संगम की स्थापना की थी।
31 अक्टुबर 1967 को गिरीजनों का एक ग्रुप सत्य- कैलासम द्वारा बुलाए गए एक सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। जिसमें पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही आदिवासियों की गिरफ्तारी को देखते हुए भावी रणनीति पर विचार-विमर्श होना था। रास्ते में लिविडी गांव में इनकी जमीदारों से मुठभेड़ हुई जिसमें गोली लगने से दो गिरिजन कोरन्ना और मनगन्ना मारे गए।
तब आदिवासियों के छोटे-छोटे बच्चों ने तीर धनुष, भालो तथा अन्य पारंपरिक हथियारों से लैस होकर सूदखोरों और जमीदारों पर हमला बोल दियाा। उनकी जमीनों पर जबरन कब्जा किया और उन पर खुद फसल बोने लगे। पुलिस ने आने पर जमीदारों की तरफदारी की जिससे आदिवासी समुदाय और भी अलग-थलग पड़ गया।
लेकिन दो आदिवासियों की हत्या और पुलिस द्वारा जमींदारों की तरफदारी तथा बाद में आरोपियों का रिहा हो जाना-इन घटनाओं ने सारा दृश्य ही बदल दिया। लगभग उसी समय चारू मजूमदार ने भी श्रीकाकुलम की गुप्त यात्रा की इससे पहले उनकी सलाह पाने के लिए यहां से दो व्यक्तियो को उनके पास भेजा गयाा थाा। मार्च
1969 में चारु मजूमदार की श्रीकाकुलम यात्रा ने यहां के आंदोलन को नई जिंदगी दी ।उन्होंने क्रांतिकारियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे श्रीकाकुलम को भारत का ऐनान बनाएंं। उन्होंने कहा कि वह 'वर्ग दुश्मन के सफाई' की नीति को पूरी ताकत से लागू करेंं।
चारू मजूमदार के दौरे के बाद श्रीकाकुलम की क्रांति और भी ज्यादा रक्तरंजित हो गई। नक्सलबाड़ी में जो नहीं हो सका था वह श्रीकाकुलम में हो गया यहां विद्रोही छापामारो को लाल इलाका( रेड कॉरिडोर) यानी मुक्त क्षेत्र बनाने में कामयाबी मिली सत्यम और कैलासम के नेतृत्व में गिरीजनों ने अपने सैनिक दस्ते बनाये और वर्ग दुश्मनो के सफाई की अनेक कार्यवाइया की ।आंध्र प्रदेश में इन विश्वविद्यालयों मे डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की शिक्षा लेने वाले अनेक मेधावी छात्र आंदोलन में शामिल हो गए। लेकिन जब पुलिस ने अंततः लाल विद्रोहियों केेे खिलाफ जबरदस्त हमलावर कार्यवाही शुरू की तो उसमें कोई भेदभााव नहीं मिला । जिन विद्रोहियोंं को उसने पकड़ा उनमें से अधिकांश की बर्बरताा पूर्वक हत्या कर दी गई ।
एक युवा क्रांतिकारी पंचादी कृष्णमूर्ति को जिसकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी कुछ अन्य विद्रोहियों के साथ पुलिस ने 27 मई 1969 को पकड़ा और उन्हें जंगल में ले जाकर गोली मार दी ।यह सिलसिला आज भी जारी है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन ने जहां यह दिखाया कि किसानों को हथियार बंद करके क्या कुछ नहीं हासिल किया जा सकता है। वहीं श्रीकाकुलम की घटनाओं में छापामार युद्ध के जरिए बहुत कुछ हासिल करने का रास्ता प्रशस्त किया।
इसके 2 साल बाद ही चारू मजूमदार उस समय गिरफ्तार कर लिए गए ।जब उनके किसी सहयोगी ने गिरफ्तार होने के बाद पुलिस यंत्रणा न झेल पाने के कारण उनके गुप्त ठिकाने की जानकारी दे दी। मजूमदार पिछले कुछ समय से पुलिस से बच रहे थे ।लेकिन अब उन्हें कोलकाता के एंटाली इलाके के एक घर से गिरफ्तार कर लिया गयाा। गिरफ्तारी तारीख के 12 दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई ।कठोर भूमिगत जीवन में अनेक तरह की बीमारियों ने घेर रखा था । जेल में उन्हें उचित चिकित्साा नहीं दी गई और 28 जुलाई 1972 को उनका निधन हो गया ।इसके साथ ही कम्युनिस्ट विद्रोह का एक महत्वपूर्ण अध्यााय समाप्त हो गया ।
लेकिन आंध्र प्रदेश में कुछ विद्रोहियों ने जिन्होंने छापामार युद्ध की क्षमता का अनुभव किया था इस चिंगारी को जिंदा रखा ।
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| लाल इतिहास की फसल-1 |
आज भारत के हृदय स्थल में इसी चिंगारी ने एक ज्वाला का रूप ले लिया है।
-सलाम बस्तर







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