और यही वह भूभाग भी है जहां भारत के निर्धारित आम(निर्धतम) लोग बसते हैं और अब शायद यही वह इलाका होगा जहां भारत का सबसे हिंसक संघर्ष चलेगा। सरकार ने अपने सैनिकों को यहां भेजा लेकिन वह बहुत कुछ नहीं कर सके। वे करते भी क्या? गांव के भीतर वह कैसे यह जान पातेे कि कौन व्यक्ति माओवादी हैै औ कौन ग्रामीण आदिवासी? अनेक मामलों में वह इस तरह का फर्क करने की जहमत भी नहीं उठाते इसीलिए भोले भाले आदिवासियों को पकड़ लिया जाता है ।उन्हें भीषण यातनाएंं दी जाती हैं उन्हें माओवादी कहा जाता है या तो माओवादी बताकर गोलियोंं से भून दिया जाता है ।इससे समस्याा क समाधान तो नहीं होता बल्कििि विद्रोह में और इजाफा हो जाताा है तथा माओवादियों की संख्या में और भी ज्यादाा वृद्धि हो जाती हैै।
जिससे कथित माओवादियों का सफाया किया जाता है। जिनके बारे में बाद में पता चलता है कि उनमें से अधिकांश निर्दोष आदिवासी थे। सरकार द्वारा नियुक्त विशेष पुलिस अधिकारियों द्वारा आदिवासी महिलाओं का बलात्कार किया जाता है कहीं किसी माओवादी शिविर को उखाड़ फेंका जाता है।
सरकार ने एक आदेश जारी किया कि जो लोग माओवादियों की मदद करते पाए जाएंगे उनके साथ सख्ती से निपटा जाएगा और उनके खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून गैर कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम यू ए पी ए के तहत कार्यवाही की जाएगी।
किसी माओवादी और किसी आदिवासी के बीच का फर्क बहुत धुंधला हो गया है इसीलिए मुमकिन है कि आप जीस आदिवासी को दिन के वक्त जंगल में सुखी टहानियां बटोरते देख रहे हैं उसे रात में बंदूक चलाते नक्सल के रूप में भी देख लें।
राज्य की नीतियों से जो शुन्य पैदा हुआ उसे माओवादी भर रहे है।
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