Tuesday, 5 September 2023

योद्धा - EK

 यदि हमारे पूर्वज युद्ध हारते ही रहे, 

तो हम 1200 साल से जिंदा कैसे हैं?


आजकल लोगों की एक सोच बन गई है कि 

राजपूतों ने लड़ाई तो की, 

लेकिन वे एक हारे हुए योद्धा थे, 

जो कभी अलाउद्दीन से हारे, 

कभी बाबर से हारे, कभी अकबर से, 

कभी औरंगज़ेब से...


क्या वास्तव में ऐसा ही है ?


यहां तक कि समाज में भी ऐसे कई

दिग्भ्रमित राजपूत हैं, 

जो महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान 

जैसे कालजयी योद्धाओं को महान तो कहते हैं, 

लेकिन उनके मन में ये हारे हुए योद्धा ही हैं!


महाराणा प्रताप के बारे में ऐसी पंक्तियाँ गर्व के साथ सुनाई जाती हैं :-


"जीत हार की बात न करिए, 

संघर्षों पर ध्यान करो"


"कुछ लोग जीतकर भी हार जाते हैं, 

कुछ हारकर भी जीत जाते हैं"

क्षत्रपति शिव जी महाराज 


असल बात ये है कि हमें वही इतिहास पढ़ाया जाता है, जिनमें हम हारे हैं, क्योंकि हमारा मनोबल कम हो,

ये कुकृत्य चाटुकार वामपंथियो द्वारा किया गया ।


मेवाड़ के राणा सांगा ने 100 से अधिक युद्ध लड़े, 

जिनमें मात्र एक युद्ध में पराजित हुए और आज उसी एक युद्ध के बारे में दुनिया जानती है, 

उसी युद्ध से राणा सांगा का इतिहास शुरु किया जाता है और उसी पर ख़त्म...


राणा सांगा द्वारा लड़े गए खंडार, अहमदनगर, बाड़ी, गागरोन, बयाना, ईडर, खातौली जैसे युद्धों की बात आती है,  तो शायद हम बता नहीं पाएंगे और अगर बता भी पाए तो उतना नहीं जितना खानवा के बारे में बता सकते हैं ।


भले ही खातौली के युद्ध में राणा सांगा अपना एक हाथ व एक पैर गंवाकर दिल्ली के इब्राहिम लोदी को दिल्ली तक खदेड़ दे, तो वो मायने नहीं रखता, 

बयाना के युद्ध में बाबर को भागना पड़ा हो 

तब भी वह गौण है...

चन्द्रगुप्त मौर्य 


इनके लिए मायने रखता है तो खानवा का युद्ध जिसमें मुगल बादशाह बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया!


सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बात आती है तो, तराईन के दूसरे युद्ध में गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया!


तराईन का युद्ध तो पृथ्वीराज चौहान द्वारा लडा गया आखिरी युद्ध था, उससे पहले उनके द्वारा लड़े गए युद्धों के बारे में कितना जानते हैं हम ?


इसी तरह महाराणा प्रताप का ज़िक्र आता है तो हल्दीघाटी नाम सबसे पहले सुनाई देता है ।


हालांकि इस युद्ध के परिणाम शुरु से ही विवादास्पद रहे, कभी अनिर्णित माना गया, कभी अकबर को विजेता माना तो हाल ही में महाराणा को विजेता माना!


बहरहाल, महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा, चावण्ड, मोही, मदारिया, कुम्भलगढ़, ईडर, मांडल, दिवेर जैसे कुल 21 बड़े युद्ध जीते व 300 से अधिक मुगल छावनियों को ध्वस्त किया!


महाराणा प्रताप के समय मेवाड़ में लगभग 50 दुर्ग थे, जिनमें से तकरीबन सभी पर मुगलों का अधिकार हो चुका था व 26 दुर्गों के नाम बदलकर मुस्लिम नाम रखे गए, जैसे उदयपुर बना मुहम्मदाबाद, चित्तौड़गढ़ बना अकबराबाद...


फिर कैसे आज उदयपुर को हम उदयपुर के नाम से ही जानते हैं ?... 

ये हमें कोई नहीं बताता!


असल में इन 50 में से 2 दुर्ग छोड़कर शेष सभी पर महाराणा प्रताप ने विजय प्राप्त की थी 

व लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ पर दोबारा अधिकार किया था!


दिवेर जैसे युद्ध में भले ही महाराणा के पुत्र अमरसिंह ने अकबर के काका सुल्तान खां को भाले के प्रहार से कवच समेत ही क्यों न भेद दिया हो, लेकिन हमें तो सिर्फ हल्दीघाटी युद्ध का इतिहास पढाएगे, 

बाकी युद्ध तो सब गौण हैं इसके आगे!


महाराणा अमरसिंह ने मुगल बादशाह जहांगीर से 17 बड़े युद्ध लड़े व 100 से अधिक मुगल चौकियां ध्वस्त कीं, लेकिन हमें सिर्फ ये पढ़ाया जाता है कि 1615 ई. में महाराणा अमरसिंह ने मुगलों से संधि की | 

ये कोई नहीं बताएगा कि 1597 ई. से 1615 ई. के बीच क्या क्या हुआ..!


महाराणा कुम्भा ने 32 दुर्ग बनवाए, कई ग्रंथ लिखे, विजय स्तंभ बनवाया, ये हम जानते हैं, पर क्या आप उनके द्वारा लड़े गए गिनती के 4-5 युद्धों के नाम भी बता सकते हैं ?


महाराणा कुम्भा ने आबू, मांडलगढ़, खटकड़, जहांजपुर, गागरोन, मांडू, नराणा, मलारणा, अजमेर, मोडालगढ़, खाटू, जांगल प्रदेश, कांसली, नारदीयनगर, हमीरपुर, शोन्यानगरी, वायसपुर, धान्यनगर, सिंहपुर, बसन्तगढ़, वासा, पिण्डवाड़ा, शाकम्भरी, सांभर, चाटसू, खंडेला, आमेर, सीहारे, जोगिनीपुर, विशाल नगर, जानागढ़, हमीरनगर, कोटड़ा, मल्लारगढ़, रणथम्भौर, डूंगरपुर, बूंदी, नागौर, हाड़ौती समेत 100 से अधिक युद्ध लड़े व अपने पूरे जीवनकाल में किसी भी युद्ध में पराजय का मुंह नहीं देखा!


चित्तौड़गढ़ दुर्ग की बात आती है तो सिर्फ 3 युद्धों की चर्चा होती है :

1) अलाउद्दीन ने रावल रतनसिंह को पराजित किया,

2) बहादुरशाह ने राणा विक्रमादित्य के समय चित्तौड़गढ़ दुर्ग जीता;

3) अकबर ने महाराणा उदयसिंह को पराजित कर दुर्ग पर अधिकार किया!


क्या इन तीन युद्धों के अलावा चित्तौड़गढ़ पर कभी कोई हमले नहीं हुए ?


इस तरह राजपूतों ने जो युद्ध हारे हैं, इतिहास में हमें वही पढ़ाया जाता है ।


बहुत से लोग हमें ज्ञान देते हैं कि राजपूतों के पूर्वजों ने सही रणनीति से काम नहीं लिया, घटिया हथियारों का इस्तेमाल किया इसीलिए हमेशा हारे हैं...


अब उन्हें किन शब्दों में समझाएं कि उन्हीं हथियारों से राजपूतों ने अनगिनत युद्ध जीते हैं, मातृभूमि का लहू से अभिषेक किया है, सैंकड़ों वर्षों तक विदेशी शत्रुओं की आग उगलती तोपों का अपनी तलवारों से सामना किया है और बार बार शत्रुओं को धूल चटाई है।


 भारत में एक से बढ़कर एक योद्धा हुए है,

इनमें एक नाम था "समुद्र गुप्त" जिस का नाम इतिहास के एक कोने में ही सिमट के रहा गया, जिसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है,

वो इन मुगलों को भगा भगा के मारा कुत्ते की तरह,अफगान, ईरान,इराक कहीं भी नहीं छोड़ा इनकी बेटी को उठा लाया साथ में ईरान,इराक़ दहेज में के आया था।साथ ही 3 बार विश्व विजय के लिए निकला था

लेकिन ऐसे योद्धा को गुमनाम कर दिया


हम जानते हैं कि वास्तव में हमारा इतिहास भारत से प्रेम करने वाली विचारधारा ने लिखा ही नहीं है, 

और कहीं न कहीं पक्षपात पूर्ण इतिहास को 

मान्यता भी मिली है हमारे देश में...

अब इतिहास का विद्वानों द्वारा पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए।


ताकि आप और हम अपने गौरवशाली भारत के चक्रवर्ती  सम्राटों और महापुरुषों के बारे में वास्तविक इतिहास पढ़ सकें और आने वाली पीढ़ियां हमें वही समझे, जो वास्तव में हम थे और हिंदुस्तान के उन वास्तविक वीरों को शत शत नमन कर सकें !

Tuesday, 22 August 2023

छप्पनिया अकाल

 भागीरथ:

वर्ष 1899-1900 में राजस्थान में एक बदनाम अकाल पड़ा था,

विक्रम संवत १९५६ (1956) में ये अकाल पड़ने के कारण राजस्थान में इसे छप्पनिया-काळ कहा जाता है,

एक अनुमान के मुताबिक इस अकाल से राजस्थान में लगभग 40-45 लाख लोगों की मृत्यु हो गयी थी,

पशु पक्षियों की तो कोई गिनती नहीं है,


लोगों ने खेजड़ी के वृक्ष की छाल खा-खा के इस अकाल में जीवनयापन किया था,

यही कारण है कि राजस्थान के लोग अपनी बहियों 

(मारवाड़ी अथवा महाजनी बही-खातों) में पृष्ठ संख्या 56 को खाली छोड़ते हैं, 

छप्पनिया-काळ की विभीषिका व तबाही के कारण राजस्थान में 56 की संख्या अशुभ मानी है,


इस दौर में बीकानेर रियासत के यशस्वी महाराजा थे,

"गंगा सिंह जी राठौड़"....

(बीका राठौड़ अथवा बीकानेर रियासत के संस्थापक राव बीका के वंशज)

अपने राज्य की प्रजा को अन्न व जल से तड़फ-तड़फ के मरता देख गंगासिंह जी का हृदय द्रवित हो उठा,

गंगासिंह जी ने सोचा क्यों ना बीकानेर से पँजाब तक नहर बनवा के सतलुज से रेगिस्तान में पानी लाया जाए ताकि मेरी प्रजा को किसानों को अकाल से राहत मिले,

नहर निर्माण के लिए गंगा सिंह जी ने एक अंग्रेज इंजीनियर आर जी कनेडी (पँजाब के तत्कालीन चीफ इंजीनियर) ने वर्ष 1906 में इस सतलुज-वैली प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की,


लेकिन...


बीकानेर से पँजाब व बीच की देशी रियासतों ने अपने हिस्से का जल व नहर के लिए जमीन देने से मना कर दिया,

नहर निर्माण में रही-सही कसर कानूनी अड़चनें डाल के अंग्रेजों ने पूरी कर दी,

महाराजा गंगासिंह जी ने परिस्थितियों से हार नहीं मानी और इस नहर निर्माण के लिए अंग्रेजों से एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीती भी,

बहावलपुर 

(वर्तमान पाकिस्तान) रियासत ने तो अपने हिस्से का पानी व अपनी ज़मीन देने से एकदम मना कर दिया,

महाराजा गंगा सिंह जी ने जब कानूनी लड़ाई जीती तो वर्ष 1912 में पँजाब के तत्कालीन गवर्नर सर डैंजिल इबटसन की पहल पर दुबारा कैनाल योजना बनी,

लेकिन...

किस्मत एक वार फिर दगा दे गई, इसी दरमियान प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था,

4 सितम्बर 1920 को बीकानेर बहावलपुर व पँजाब रियासतों में ऐतिहासिक सतलुज घाटी प्रोजेक्ट समझौता हुआ,

महाराजा गंगासिंह जी ने 1921 में गंगनहर की नींव रखी,

26 अक्टूम्बर 1927 को गंगनहर का निर्माण पूरा हुआ,

हुसैनवाला से शिवपुरी तक 129 किलोमीटर लंबी ये उस वक़्त दुनिया की सबसे लंबी नहर थी,

गंगनहर के निर्माण में उस वक़्त कुल 8 करोड़ रुपये खर्च हुए,

गंगनहर से वर्तमान में 30 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है,

इतना ही नहीं,

वर्ष 1922 में महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर में हाई-कोर्ट की स्थापना की .... 


इस उच्च-न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश के अलावा 2 अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भी की,

इस प्रकार बीकानेर देश में हाई-कोर्ट की स्थापना करने वाली प्रथम रियासत बनी,

वर्ष 1913 में महाराजा गंगासिंह जी ने चुनी हुई जनप्रतिनिधि सभा का गठन किया,


महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर रियासत के कर्मचारियों के लिए एंडोमेंट एश्योरेंस स्कीम व जीवन बीमा योजना लागू की,

महाराजा गंगासिंह जी ने निजी बैंकों की सुविधाएं आम नागरिकों को भी मुहैय्या करवाई,

महाराजा गंगासिंह जी ने बाल-विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट कड़ाई से लागू किया,

महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर शहर के परकोटे के बाहर गंगाशहर नगर की स्थापना की,

बीकानेर रियासत की इष्टदेवी मां करणी में गंगासिंह जी की अपने पूर्व शासकों की भांति अपार आस्था थी,

इन्होंने देशनोक धाम में मां करणी के मंदिर का जीणोद्धार भी करवाया,

महाराजा गंगासिंह जी की सेना में गंगा-रिसाला नाम से ऊंटों का बेड़ा भी था,

इसी गंगा-रिसाला ऊंटों के बेड़े के साथ महाराजा गंगासिंह जी ने प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध में अदम्य साहस शौर्य वीरता से युद्ध लड़े,

इन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा उस वक़्त सर्वोच्च सैन्य-सम्मान से भी नवाजा गया,

गंगासिंह जी के ऊंटों का बेड़ा गंगा-रिसाला आज सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की शान है, व देश सेवा में गंगा-रिसाला हर वक़्त मुस्तैद है।

(प्रस्तुत चित्र में महाराजा गंगासिंह जी के पास उनकी पौत्री बीकानेर की राजकुमारी राजश्री खड़ी है,

महाराजा गंगासिंह जी की गोद में उनके पौत्र कुंवर करणीसिंह जी है)

(बाद में महाराजा करणीसिंह, निशानेबाजी में भारत के प्रथम अर्जुन पुरस्कार विजेता)

(वर्तमान में करणीसिंह जी की पौत्री व बीकानेर राजकुमारी सिद्धि कुमारी जी (सिद्धि बाईसा) बीकानेर से भाजपा विधायक है)

कहते हैं मां गंगा को धरती पे राजा भागीरथ लाये थे इसलिए गंगा नदी को भागीरथी भी कहा जाता है,

21 वर्षों के लंबे संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद महाराजा गंगासिंह जी ने अकाल से झूंझती बीकानेर/राजस्थान की जनता के लिए गंगनहर के रूप रेगिस्तान में जल गंगा बहा दी थी,

गंगनहर को रेगिस्तान की भागीरथी कहा जाता है,

इसलिए...

महाराजा गंगासिंह जी को मैं कलयुग का भागीरथ कहूँ तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी !!!!

Friday, 18 August 2023

विभाजित मिर्ज़ापुर - सोनभद्र

  "गोविंद बल्लव पंत सागर" एक प्रमुख हिंदी कवि थे जिन्होंने भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने नायकवाद के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य और जीवन के सौंदर्य का परिप्रेक्ष्य दिखाने का प्रयास किया।

गोविंद बल्लव पंत का जन्म ६ अक्टूबर, १९०२ को उत्तराखंड के आल्मोड़ा जिले के काप्ताड़ा गाँव में हुआ था। उन्होंने बचपन में ही कविता लिखने की शुरुआत की और बड़े होने पर काव्य के क्षेत्र में अपने योगदान को और भी मजबूती दी।

गोविंद बल्लव पंत की कविताएँ प्राकृतिक जीवन, प्रेम, दृष्टिकोण, और मानवीय भावनाओं पर आधारित होती थीं। उन्होंने अपनी कविताओं में उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य को बहुत विविधता से चित्रित किया और उनके काव्य में भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिष्ठान रहा।

उनकी प्रमुख रचनाएँ शिखर यात्रा, नौका विहार, बालदास, आदि हैं। उन्होंने बालकों के लिए भी लोकप्रिय कविताएँ लिखी जो बच्चों के मनोबल को बढ़ाती थीं।

गोविंद बल्लव पंत का निधन ५ फरवरी, १९६१ को हुआ था, लेकिन उनकी कविताएँ और उनकी साहित्यिक योगदान आज भी हमारे साहित्य के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में मान्यता प्राप्त करते हैं।

आज बात गोविंद बल्लभ पंत सागर की जिसे आप रिहंद बांध के नाम से जानते और पहचानते भी हैं।

क्षमता के हिसाब से देश का सबसे बड़ा बांध। रिहंद बांध प्रोजेक्ट का काम लगभग 1954 से शुरू हुआ और साल 1962 तक बनकर तैयार हो गया।  बांध के निचले हिस्से में बिजली बनाने के लिए 6 यूनिट लगाई गई। एक यूनिट से 50 मेगावाट बिजली का उत्पादन होने लगा ऐसे में सभी 6 यूनिट के काम करने पर 300 मेगावाट बिजली उत्पादन होने लगी। रिहंद बांध से बिजली उत्पादन के बाद कोई सुपर थर्मल पावर स्टेशन भी बनाए गये। जो सिंगरौली,रिहंद,विंध्याचल,अनपरा,रेणुकूट ने स्थापित किए गए। यह कहना गलत नहीं होगा कि सोनभद्र ही इसकी नींव है।

सोनभद्र भारत के उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। सोनभद्र भारत का एकमात्र जिला है जो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ झारखंड और बिहार के चार राज्यों से है। लोकप्रिय टीवी शो कौण बनगा करोड़पति में, अभी उल्लेख किए गए तथ्य के आधार पर 50 लाख रुपये का एक प्रश्न पूछा गया था। जिले में 6788 वर्ग किमी का क्षेत्रफल है और इसकी आबादी 1,862,559 (2011 की जनगणना) है, जिसमें प्रति वर्ग वर्ग 270 व्यक्तियों की जनसंख्या घनत्व है। यह राज्य के चरम दक्षिणपूर्व में स्थित है, और उत्तरपश्चिमी में मिर्जापुर जिला, उत्तर में चंदौली जिला, बिहार राज्य के कैमर और रोहतस जिले पूर्वोत्तर तक, झारखंड राज्य के गढ़वा जिले में पूर्व, कोरिया और सर्जुजा जिलों से घिरा हुआ है। दक्षिण में छत्तीसगढ़ राज्य, और मध्य प्रदेश राज्य के सिंगराउली जिले पश्चिम में। जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज शहर में है। सोनभद्र जिला एक औद्योगिक क्षेत्र है और इसमें बॉक्साइट, चूना पत्थर, कोयला, सोना आदि जैसे बहुत सारे खनिज हैं। सोंभद्र को भारत की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है [उद्धरण वांछित] क्योंकि इतनी सारी शक्तियां हैं पौधों।

इतिहास

धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण रामायण और महाभारत के साक्ष्य के आधार पर, यहां मिले हुयेन सांस्कृतिक प्रतीक हैं। जरासंध द्वारा महाभारत युद्ध में कई शासकों को यहां कैदी बनाए रखा गया था। सोन नदी की घाटी गुफाओं में प्रचलित है जो प्राचीन निवासियों के सबसे शुरुआती घर थे। ऐसा कहा जाता है कि ‘भार’ के पास 5 वीं शताब्दी तक जिले में चेरोस, सीरीस, कोल्स और खेरवार समुदायों के साथ समझौता हुआ था, विजयगढ़ किले पर ‘कोल’ राजाओं का शासन था। यह जिला 11 वीं से 13 वीं शताब्दी के दौरान दूसरी काशी के रूप में प्रसिद्ध था। 9वीं शताब्दी ईसा पूर्व में, ब्राह्मणत्त वंश को नागास द्वारा विभाजित किया गया था। 8 वीं और 7 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में, जिले का वर्तमान क्षेत्र कौशला और मगध में था। गुप्ता काल के आगमन से पहले कुशंस और नागा भी इस क्षेत्र में सर्वोच्चता रखते थे। 7 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद, यह गजनी के महमूद द्वारा संचालित किए जाने से पहले 1025 तक गुर्जर और प्रतिहारों के नियंत्रण में रहा। यह क्षेत्र मुगल सम्राटों के विभिन्न गवर्नरों के प्रशासन में था। एगोरी किले जैसे कुछ किले मदन शाह के नियंत्रण में थे।

18 वीं शताब्दी के दौरान, जिला बनारेस राज्य के नारायण शासकों के नियंत्रण में आया, जिन्होंने जिले में कई किले बनाए या कब्जा कर लिया। 1775 के दशक के दशक में, अंग्रेजों ने बनारस के राजों के अधिकांश क्षेत्र के प्रशासनिक नियंत्रण को संभाला। मिर्जापुर के ब्रिटिश जिले में वर्तमान में मिर्जापुर और सोनभद्र जिले शामिल थे, वर्तमान में सोनबद्र जिले में रॉबर्ट्सगंज तहसील शामिल थे।

1901 की जनगणना में, रॉबर्ट्सगंज तहसील की आबादी 221,717 थी, जिसमें दो कस्बों और 1,222 गांव थे। 1 9 8 9 में, सोनभद्र जिला मिर्जापुर जिले से विभाजित था।

किले जिले में स्थित हैं

आगोरी किला – मदन शाह द्वारा शासित
विजयगढ़ किला – बनारस के राजा चैत सिंह द्वारा शासित
सोध्रिगढ़ दुर्ग- गढ़वाल राजाओं द्वारा शासित।

देवकी नंदन खत्री द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध उपन्यास चंद्रकांत की नायिका विजयगढ़ की राजकुमारी और राजा जय सिंह की बेटी थी।

भूगोल

जिले का उत्तरी तीसरा कैमर रेंज के उत्तर में पठार पर स्थित है, और बेलान और कर्मानाशा नदियों समेत गंगा की सहायक नदियों द्वारा निकाला जाता है। कैमर रेंज के खड़े इलाके के दक्षिण में सोन नदी की घाटी है, जो पश्चिम से पूर्व तक जिले के माध्यम से बहती है। जिले का दक्षिणी भाग पहाड़ी है, जो उपजाऊ धारा घाटियों से घिरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के सर्जुजा जिले के पहाड़ी इलाकों में दक्षिण में उगने वाली रिहांद नदी जिले के केंद्र में पुत्र में शामिल होने के लिए उत्तर बहती है। रिहाना पर एक जलाशय गोविंद बल्लभ पंत सागर आंशिक रूप से जिले में और आंशिक रूप से मध्य प्रदेश में स्थित है। रिहाण्ड के पूर्व, कनहर नदी, जो छत्तीसगढ़ में निकलती है, पुत्र में शामिल होने के लिए उत्तर बहती है।

जिले में बागेलखंड क्षेत्र के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिकीय सम्बन्ध हैं। रॉबर्ट्सगंज जिला मुख्यालय है।

जलवायु

सोनभद्र में गर्मी और सर्दियों के तापमान के बीच उच्च भिन्नता के साथ अपेक्षाकृत उपोष्णकटिबंधीय जलवायु है। गर्मियों में औसत तापमान 30 डिग्री सेल्सियस -46 डिग्री सेल्सियस और सर्दियों में 2 डिग्री सेल्सियस -15 डिग्री सेल्सियस है। मौसम जुलाई से अक्टूबर तक बरसात के मौसम में सुखद है।

परिस्थितिकी

सोन नदी के उत्तर में जिले का हिस्सा निचले गंगा के मैदानी नमक पर्णपाती जंगलों में घिरा हुआ है। पुत्र के दक्षिण में भाग छोटा नागपुर सूखी पर्णपाती जंगलों में घिरा हुआ है।

कैमर वन्यजीव अभयारण्य ज्यादातर जिले के भीतर स्थित है, जो आमतौर पर कैमर रेंज की रीढ़ की हड्डी के साथ पूर्व और पश्चिम तक पहुंचता है, और अपने पूर्वी छोर पर सोन नदी तक फैलता है।

अर्थव्यवस्था

सोनभद्र के दक्षिणी क्षेत्र को “भारत की ऊर्जा राजधानी” कहा जाता है, इस क्षेत्र में गोविंद बल्लभ पंत सागर के आसपास कई विद्युत पावर स्टेशन हैं। एनटीपीसी (भारत में अग्रणी बिजली उत्पादन कंपनी) में तीन कोयले आधारित थर्मल पावर प्लांट हैं।

सिंगराउली सुपर थर्मल पावर स्टेशन, शक्तिनगर 2000 मेगावाट (भारत का पहला एनटीपीसी पावर प्लांट)
विंध्याचल थर्मल पावर स्टेशन (भारत में सबसे बड़ी क्षमता, 4760 मेगावाट)
3. रिहाण्ड थर्मल पावर स्टेशन, रेणुकुट 3000 मेगावाट।

अन्य बिजली स्टेशन अंपारा (यूपीआरवीयूएनएल), ओबरा (यूपीआरवीयूएनएल), रेनुसगर (हिंडाल्को) और पिप्ररी-हाइड्रो (यूपीआरवीयूएनएल) में हैं। एनसीएल (कोयला इंडिया लिमिटेड की एक शाखा) के मुख्यालय और इस क्षेत्र में कई कोयला खान हैं। रेनुकुट में हिंडाल्को का एक बड़ा एल्यूमीनियम संयंत्र है।

यह क्षेत्र वन और पहाड़ियों के क्षेत्र से औद्योगिक स्वर्ग बन गया। कुछ पहाड़ियों में चूना पत्थर था और उनमें से बहुत से कोयले थे। क्षेत्र के माध्यम से चल रही कुछ छोटी नदियां थीं और प्रमुख पुत्र था।

चूना पत्थर पहाड़ियों के कारण, 1956 में चुर्क में शुरू में एक सीमेंट कारखाना स्थापित किया गया था। बाद में 1 9 71 में दला में एक और सीमेंट कारखाना शुरू हुआ था, उन्हें नाम दिया गया था, दला सीमेंट कारखाना यह सीमेंट संयंत्र एशिया में सबसे बड़ा संयंत्र है और 1 9 80 में चुनार में दला की सहायक इकाई शुरू हुई थी। सीमेंट कारखानों की नींव बन गई जिस पर अन्य उद्योग बनाए गए थे। 1 9 61 में पिपरी में एक बड़ा बांध बनाया गया और रिहंद बांध नाम दिया गया। बांध 300 मेगावॉट बिजली का उत्पादन करता है। 1 9 68 में ओबरा में एक और छोटा बांध बनाया गया था, रिहांद बांध से 40 किमी दूर, जो 99 मेगावाट बिजली उत्पन्न करता है।

बिड़ला समूह ने फिर रेणुकुट में एक एल्यूमीनियम संयंत्र स्थापित किया, जो हिंडाल्को का सबसे बड़ा एल्यूमीनियम संयंत्र है। बाद में, बिड़ला समूह ने 1967 में रेनुसगर में अपना बिजली संयंत्र स्थापित किया। इस संयंत्र में 887.2 मेगावॉट की वर्तमान क्षमता है और हिंडाल्को को बिजली की आपूर्ति है। बिड़ला ने रेनुकुट में एक कंपनी भी शुरू की जिसे हायटेक कार्बन कहा जाता है। एक अन्य औद्योगिक समूह ने कनोरिया केमिकल्स नामक रेणुकुट में एक कंपनी की शुरुआत की, जो रसायनों का उत्पादन करता है और बाद में 1 99 8 में रेनुकूट में अपना बिजली संयंत्र शुरू करता था जो 50 मेगावाट बिजली उत्पन्न करता है।

1967 में रूसी इंजीनियरों के समर्थन के साथ ओबरा में एक बड़ा थर्मल पावर प्लांट निर्माण शुरू किया गया था और 1 9 71 में सफलतापूर्वक पूरा किया गया था। इसमें 1550 मेगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता थी। 1 9 80 में अंपारा में एक अन्य बिजली संयंत्र शुरू किया गया था। यह 1630 मेगावॉट का उत्पादन करता है बिजली और 2630 मेगावॉट तक क्षमता बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। एनटीपीसी का पहला थर्मल पावर प्लांट जो इसे शक्तिनगर में शुरू हुआ, 2000 मेगावाट उत्पन्न करता है। बीजपुर में संयंत्र 3000 मेगावॉट का उत्पादन करता है। दल्ला सुपर 6 जैपी समूह द्वारा नया संयंत्र बना है और 2012 में 8500 एमटीपी में उत्पादित एक आदित्य बिड़ला समूह खरीदा

इस क्षेत्र में तीन सीमेंट कारखानों, सबसे बड़े एल्यूमीनियम संयंत्रों में से एक, एक कार्बन संयंत्र, एक रासायनिक कारखाना और भारत का ऊर्जा केंद्र है, जो 20000 मेगावाट तक पहुंचने की योजना के साथ 11000 मेगावाट उत्पन्न करता है। पूरा देश इस क्षेत्र से लाभान्वित हो रहा है, जो एक बार जंगलों और पहाड़ियों से भरा था, जो उपजाऊ भूमि की तरह लग रहा था।

2006 में पंचायती राज मंत्रालय ने देशभद्र नामक देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों में से एक (कुल 640 में से) का नाम दिया। [3] यह उत्तर प्रदेश के 34 जिलों में से एक है जो वर्तमान में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि कार्यक्रम (बीआरजीएफ) से धन प्राप्त कर रहा है। [3]

उद्योग समयरेखा

1956: चुर्क सीमेंट फैक्टरी, 800 टी / दिन।

1961: रिहांद बांध, पिपरी, 300 मेगावाट बिजली, बिजली संयंत्रों के लिए जलाशय।

1962: हिंडाल्को एल्यूमिनियम प्लांट, रेनुकूट, एल्युमिना रिफाइनिंग – 114,5000 टीपीए, एल्यूमिनियम धातु – 424,000 टीपीए।

1965: आदित्य बिड़ला रसायन, रेणुकूट, एसीटाल्डेहाइड – 10000 टीपीए, फॉर्मल्डेहाइड – 75000 टीपीए, लिंडेन – 875 टीपीए, हेक्सामाइन – 4000 टीपीए, औद्योगिक शराब – 225 मिलियन लीटर / सालाना, एल्यूमिनियम क्लोराइड – 6875 टीपीए, एथिल एसीटेट – 3300 टीपीए, एसिटिक एसिड – 6000 टीपीए, वाणिज्यिक हाइड्रोजन।

1967: रेनुसगर पावर प्लांट (हिंडाल्को), 741.7 मेगावाट बिजली।

1968: ओबरा बांध, 99 मेगावॉट बिजली, बिजली संयंत्र के लिए जलाशय ..

1971: दल्ला सीमेंट फैक्ट्री प्लांट, एपी सरकार। लेकिन आदित्य बिड़ला समूह में मौजूद है।

1971: ओबरा थर्मल पावर प्लांट, उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड (यूपीएसईबी), 1550 मेगावाट बिजली।

1980: चुन सीमेंट फैक्टरी, दला सीमेंट फैक्ट्री की सहायक इकाई।

1980: विंधया पत्थर क्रूज़िंग कंपनी कुवारी।

1980: अंपाड़ा थर्मल पावर प्लांट, यूपीएसईबी, 2000 मेगावाट बिजली।

1983: बीपी कंस्ट्रक्शन कंपनी, अंपारा।

1984: सिंगरौली थर्मल पावर प्लांट, एनटीपीसी लिमिटेड (एनटीपीसी), शक्तिनगर, 2000 मेगावाट बिजली।

1985: मिश्रा स्टोन क्रशिंग कंपनी।

1988: हाय-टेक कार्बन, रेनुकूट, कार्बन ब्लैक – 1,60,000 मीट्रिक टन / सालाना।

1989: विंधया पत्थर क्रूज़िंग कंपनी बागवनवा ओबरा।

1989: रिहंद थर्मल पावर प्लांट, एनटीपीसी, बीजपुर, 3000 मेगावाट बिजली।

1990: हिल्स, मिर्चधुरी में गोल्ड माइन का पता लगाना।

1993: जन कल्याण ग्रामोडोग सेवा आश्रम सोनभद्र। 

1997: ए के ब्रदर्स एंड एसोसिएट्स, अंपारा।

1998: कनोरिया केमिकल्स पावर प्लांट, रेनुकूट, 50 मेगावाट बिजली।

2008: 1200 मेगावाट बिजली, लैंको अंपाड़ा पावर लिमिटेड।

2012: दल्ला में दला सुपर छह खुला नया संयंत्र

2014: बीजीआर आउटसोर्सिंग कंपनी कोयला खानों

Thursday, 17 August 2023

नोवाक जोकोविच

 

 

नोवाक जोकोविच सर्बिया के एक पेशेवर टेनिस खिलाड़ी हैं। उन्हें व्यापक रूप से सर्वकालिक महान टेनिस खिलाड़ियों में से एक माना जाता है। जोकोविच का जन्म 22 मई, 1987 को बेलग्रेड, सर्बिया में हुआ था।


 

अपने पूरे करियर में, जोकोविच ने कई रिकॉर्ड और मील के पत्थर हासिल किए हैं। उन्होंने कई ग्रैंड स्लैम खिताब जीते हैं, जिनमें ऑस्ट्रेलियन ओपन, फ्रेंच ओपन, विंबलडन और यूएस ओपन में जीत शामिल हैं। वह सभी प्रकार के कोर्ट पर अपने असाधारण कौशल के लिए जाने जाते हैं और राफेल नडाल और रोजर फेडरर जैसे अन्य टेनिस दिग्गजों के साथ उनकी विशेष रूप से मजबूत प्रतिद्वंद्विता है।

 

जोकोविच की उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी के रूप में बिताए गए सबसे अधिक हफ्तों का रिकॉर्ड है। ए. टी. पी. रैंकिंग में 1 रैंक वाले खिलाड़ी। उन्होंने करियर ग्रैंड स्लैम भी पूरा कर लिया है, जिसका अर्थ है कि उन्होंने कम से कम एक बार सभी चार प्रमुख ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट जीते हैं।

 

जोकोविच को उनके अविश्वसनीय लचीलेपन, चपलता, सर्विस की वापसी और कोर्ट पर मानसिक लचीलेपन के लिए जाना जाता है। उनकी खेलने की शैली उनकी मजबूत आधारभूत खेल और असाधारण रक्षात्मक कौशल की विशेषता है। वह इतिहास के उन कुछ खिलाड़ियों में से एक हैं जिन्होंने एक साथ सभी चार ग्रैंड स्लैम खिताब जीते हैं, एक उपलब्धि जो उन्होंने 2015-2016 में हासिल की थी।


 

यह ध्यान देने योग्य है कि मेरा ज्ञान केवल जुलाई  2023 तक अद्यतित है, इसलिए मेरे पास उस तारीख के बाद जोकोविच की नवीनतम उपलब्धियों या घटनाओं के बारे में सबसे वर्तमान जानकारी नहीं हो सकती है।

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Wednesday, 16 August 2023

क्रिकेट -एक खेल

क्रिकेट एक लोकप्रिय बल्ले और गेंद का खेल है जो ग्यारह खिलाड़ियों की दो टीमों के बीच खेला जाता है। यह आमतौर पर भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका और वेस्ट इंडीज जैसे देशों में खेला जाता है। यह खेल अपने समृद्ध इतिहास, रणनीतिक जटिलता और उत्साही प्रशंसक आधार के लिए जाना जाता है। 
यहाँ क्रिकेट के बुनियादी नियमों और अवधारणाओं का अवलोकन दिया गया हैः
उद्देश्यः क्रिकेट का मुख्य उद्देश्य एक टीम के लिए दूसरे की तुलना में अधिक रन बनाना है जबकि विरोधी टीम के बल्लेबाजों को भी आउट करना है। टीमः प्रत्येक टीम में ग्यारह खिलाड़ी होते हैं, जिसमें एक टीम बल्लेबाजी करती है और दूसरी टीम क्षेत्ररक्षण करती है। बल्लेबाजी और क्षेत्ररक्षण की भूमिकाएँ एक निर्धारित ओवरों के बाद या जब बल्लेबाजी करने वाली टीम के सभी बल्लेबाज आउट हो जाते हैं तो बदल जाती हैं। बल्लेबाजीः बल्लेबाजी करने वाली टीम के खिलाड़ी जोड़ी में बारी-बारी से बल्लेबाजी करते हैं। एक बल्लेबाज का लक्ष्य विपक्ष के गेंदबाज द्वारा फेंकी गई गेंद को मारकर और विकेटों के बीच दौड़कर रन बनाना है। बल्लेबाजों का लक्ष्य आउट होने से बचना और अधिक से अधिक रन बनाना होता है।
गेंदबाजीः गेंदबाजी दल के खिलाड़ी, जिन्हें गेंदबाज के रूप में जाना जाता है, बल्लेबाजों की ओर गेंद फेंकने के लिए बारी-बारी से गेंदबाजी करते हैं। गेंदबाजों का प्राथमिक लक्ष्य बल्लेबाजों को विभिन्न तरीकों से आउट करके आउट करना होता है।
 बर्खास्तगीः बल्लेबाजों को विभिन्न तरीकों से आउट किया जा सकता है, जिसमें आउट किया जाना, क्षेत्ररक्षक द्वारा कैच आउट किया जाना, रन आउट (जब एक क्षेत्ररक्षक गेंद से विकेट तोड़ता है जबकि बल्लेबाज विकेटों के बीच दौड़ रहे होते हैं) स्टंप किया जाता है (जब विकेटकीपर विकेट तोड़ता है जबकि बल्लेबाज अपनी क्रीज से बाहर होता है) या लेग बिफोर विकेट (एलबीडब्ल्यू) जब गेंद बल्ले से टकराने से पहले बल्लेबाज के पैर से टकराती है और अंपायर बल्लेबाज के आउट होने का फैसला करता है।
 रनः बल्लेबाज गेंद को मारकर और विकेटों के बीच दौड़कर रन बनाते हैं। यदि गेंद सीमा को पार करती है, तो बल्लेबाजी करने वाली टीम को चार रन दिए जाते हैं। यदि गेंद को जमीन को छुए बिना सीमा के ऊपर मारा जाता है, तो यह एक छक्का है। ओवरः एक ओवर में छह गेंदें होती हैं। (bowled by the same bowler). क्रिकेट मैच में ओवरों की संख्या खेल के प्रारूप के आधार पर भिन्न हो सकती है। (Test, One Day International, or T20). प्रारूपः क्रिकेट विभिन्न प्रारूपों में खेला जाता है, जिसमें टेस्ट मैच, एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय (ओडीआई) और ट्वेंटी-20 (टी20) मैच शामिल हैं। टेस्ट मैच लंबे होते हैं और पांच दिनों तक चल सकते हैं, जबकि एकदिवसीय और टी20 मैच छोटे और अधिक तेज गति वाले होते हैं। अंपायरः खेल को दो ऑन-फील्ड अंपायरों द्वारा संचालित किया जाता है जो खेल के बारे में निर्णय लेते हैं, जिसमें बर्खास्तगी और अन्य नियमों के बारे में निर्णय शामिल हैं। क्षेत्ररक्षण की स्थितिः क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम गेंद फेंकने के प्रकार और बल्लेबाज की शैली के आधार पर अपने खिलाड़ियों को रणनीतिक रूप से मैदान पर विभिन्न स्थानों पर रखती है। क्रिकेट के बड़े पैमाने पर वैश्विक प्रशंसक हैं, और आईसीसी क्रिकेट विश्व कप, टी20 विश्व कप जैसे प्रमुख टूर्नामेंट और इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) जैसे विभिन्न घरेलू लीग भारी दर्शकों को आकर्षित करते हैं। यह खेल समय के साथ विकसित हुआ है और दुनिया भर के खेल प्रेमियों को आकर्षित करना जारी रखता है।

Tuesday, 15 August 2023

रामायण क्या है ?

वेद जिस परम तत्व का वर्णन करते है, वही श्रीमत्रारायनतत्व श्रीमद्रामअयनो मे श्री राम रूप से निरूपित है । वेद्वेद्द परमपुरूर्सोत्तम के दशरथनन्दन श्री राम के रूप मे अवतीर्ण होने पर साक्षात वेद ही श्री वाल्मीकि के मुख से श्री रामायण रूप मे प्रकट हुये , ऐसी आस्तिकोंकी चिरकाल से मान्यता है इसलिए श्रीमद वाल्मीकि रामायण की वेदतुल्य ही प्रतिस्ठा है यों भी महर्षि वाल्मीकि आदिकवि है , अत विश्व के समस्त कवियों के गुरु है । उनका 'आदिकाव्य ' श्रीमदवाल्मिकीय रामायण भू तल का प्रथम काव्य है वह सभी के लिए पूज्य वस्तु है और देश की सच्ची बहुमूल्य राष्ट्रीय निधि है इस नाते भी वह सबके लिए संग्रह पठन मनन एवं श्रवण करने की वस्तु है इसका एक एक अक्षर महापातक का नाशं करने वाला है
एकैकमक्षर पुंसां महापातकनाशनम यह समस्त काव्यो का बीज है --- काव्यबीजं सनातनम
श्री व्यासदेव जी एवं सभी कवियों ने इसका अध्ययन कर पुराण,महाभारतदिका निर्माण किया 'वृहद्म्पुरान' में यह बात विस्तार से प्रतिपादित है श्रीव्यास जी ने अनेक पुराणों में रामायण का माहात्म्य गाया है स्कन्दपुराण का रामायणमहात्यम तो इस ग्रंथ के आरम्भ में दिया ही है कई छिट- पुट माहात्म्य अलग भी है यह भी प्रसिद्ध है की व्यास जी ने युधिष्ठिर के अनुरोध से एक व्याख्या वाल्मीकिरामायण पर लिखी थी और उसकी एक हस्तलिखित प्रति अब भी प्राप्य है इसका नाम रामायणतात्पर्यदीपिका है इसका उल्लेख "दिवानबहादुर रामशास्त्री " ने अपनी पुस्तक स्टडीज इन रामायण के द्वितीय खण्ड में किया है ह पुस्तक १९४४ ई. में बड़ोदा से प्रकाशित है

Thursday, 27 July 2023

मणिपुर हिंसा

                                            

  "अफीम" एक अत्यधिक नशे की लत वाली मादक दवा को संदर्भित करता है जो अफीम पोस्ता के सूखे लेटेक्स से प्राप्त होती है। (Papaver somniferum). अफीम में मॉर्फिन और कोडीन सहित विभिन्न एल्कलॉइड होते हैं, जिनमें शक्तिशाली दर्द निवारक और शामक प्रभाव होते हैं। इसका उपयोग सदियों से औषधीय और मनोरंजन दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है।


मॉर्फिन, अफीम के प्राथमिक घटकों में से एक, एक शक्तिशाली दर्दनाशक है और गंभीर दर्द को प्रबंधित करने के लिए चिकित्सा सेटिंग्स में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। हालाँकि, इसमें दुर्व्यवहार और लत की उच्च संभावना भी है। कोडीन, अफीम में पाया जाने वाला एक अन्य क्षारीय पदार्थ, मॉर्फिन की तुलना में कम शक्तिशाली है, लेकिन फिर भी इसका उपयोग दर्द निवारक और खांसी दबाने वाले के रूप में किया जाता है।


पूरे इतिहास में अफीम और उसके व्युत्पन्न पदार्थों का समाजों और संस्कृतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। 19वीं शताब्दी में, चीन और पश्चिमी शक्तियों, विशेष रूप से ब्रिटेन के बीच अफीम के युद्ध अफीम के व्यापार को लेकर लड़े गए थे। अफीम की लत के नकारात्मक सामाजिक और स्वास्थ्य परिणामों ने इसके उपयोग को नियंत्रित करने और वैकल्पिक दर्द प्रबंधन दवाओं के विकास के प्रयासों को प्रेरित किया।


आज, अफीम में पाए जाने वाले कई शक्तिशाली यौगिक, जैसे कि मॉर्फिन और कोडीन, का उपयोग विभिन्न दर्द दवाओं के आधार के रूप में किया जाता है, दोनों अपने प्राकृतिक रूप में और संश्लेषित रूपों में। दुरुपयोग और लत की संभावना के कारण इन दवाओं को सख्ती से नियंत्रित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, चिकित्सा उद्देश्यों के लिए इन पदार्थों के उपयोग और दुरुपयोग और निर्भरता के जोखिमों के साथ उनके लाभों को संतुलित करने की आवश्यकता के बारे में चर्चा चल रही है।

मणिपुर में अफीम की खेती भी मुख्य कारण।

 मणिपुर में बसी एक विदेशी मूल की जाति कुकी है, जो मात्र डेढ़ सौ वर्ष पहले पहाड़ों में आ कर बसी थी। ये मूलतः मंगोल नश्ल के लोग हैं। जब अंग्रेजों ने चीन में अफीम की खेती को बढ़ावा दिया तो उसके कुछ दशक बाद अंग्रेजों ने ही इन मंगोलों को वर्मा के पहाड़ी इलाके से ला कर मणिपुर में अफीम की खेती में लगाया। आपको आश्चर्य होगा कि तमाम कानूनों को धत्ता बता कर ये अब भी अफीम की खेती करते हैं और कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इनके व्यवहार में अब भी वही मंगोली क्रूरता है, और व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध का भाव है। मतलब नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे।


    अधिकांश कुकी यहाँ अंग्रेजों द्वारा बसाए गए हैं, पर कुछ उसके पहले ही रहते थे। उन्हें वर्मा से बुला कर मैतेई राजाओं ने बसाया था। क्यों? क्योंकि तब ये सस्ते सैनिक हुआ करते थे। सस्ते मजदूर के चक्कर में अपना नाश कर लेना कोई नई बीमारी नहीं है। आप भी ढूंढते हैं न सस्ते मजदूर? खैर...

    आप मणिपुर के लोकल न्यूज को पढ़ने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि कुकी अब भी अवैध तरीके से वर्मा से आ कर मणिपुर के सीमावर्ती जिलों में बस रहे हैं। सरकार इस घुसपैठ को रोकने का प्रयास कर रही है, पर पूर्णतः सफल नहीं है।

    आजादी के बाद जब उत्तर पूर्व में मिशनरियों को खुली छूट मिली तो उन्होंने इनका धर्म परिवर्तन कराया और अब लगभग सारे कुकी ईसाई हैं। और यही कारण है कि इनके मुद्दे पर एशिया-यूरोप सब एक सुर में बोलने लगते हैं।

     इन लोगों का एक विशेष गुण है। नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे। क्या सरकार, क्या सुप्रीम कोर्ट? अपुनिच सरकार है! "पुष्पा राज, झुकेगा नहीं साला" 


     सरकार कहती है, अफीम की खेती अवैध है। ये कहते हैं, "तो क्या हुआ? हम करेंगे।" कोर्ट ने कहा, "मैतेई भी अनुसूचित जाति के लोग हैं।" ये कहते हैं, "कोर्ट कौन? हम कहते हैं कि वे अनुसूचित नहीं हैं, मतलब नहीं हैं। हमीं कोर्ट हैं। 

 


  मैती, मैतेई या मैतई... ये मणिपुर के मूल निवासी हैं। सदैव वनवासियों की तरह प्राकृतिक वैष्णव जीवन जीने वाले लोग। पुराने दिनों में सत्ता इनकी थी, इन्हीं में से राजा हुआ करते थे। अब राज्य नहीं है, जमीन भी नहीं है। मणिपुर की जनसंख्या में ये आधे से अधिक हैं, पर भूमि इनके पास दस प्रतिशत के आसपास है। उधर कुकीयों की जनसंख्या 30% है, पर जमीन 90% है।

     90% जमीन पर कब्जा रखने वाले कुकीयों की मांग है कि 10% जमीन वाले मैतेई लोगों को जनजाति का दर्जा न दिया जाय। वे लोग विकसित हैं, सम्पन्न हैं। यदि उनको यदि अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया तो हमारा विकास नहीं होगा। हमलोग शोषित हैं, कुपोषित हैं...   कितनी अच्छी बात है न?


     अब मैतेई भाई बहनों की दशा देखिये। जनसंख्या इनकी अधिक है, विधायक इनके अधिक हैं, सरकार इनके समर्थन की है। पर कोर्ट से आदेश मिलने के बाद भी ये अपना हक नहीं ले पा रहे हैं। क्यों? इसका उत्तर समझना बहुत कठिन नहीं है।

     

Wednesday, 26 July 2023

सुनील छेत्री : The Footballer

 क्या आप इन्हें जानते हैं ?? विराट कोहली से कम प्रशंसक हैं इस शक़्स के । पर काम ये भी वैसा ही करते हैं अपने देश के लिए , जैसा क्रिकेट के खिलाड़ी करते हैं 



ये हैं हमारे देश के फुटबॉल खिलाड़ी सुनील क्षेत्री नाम तो सुना ही होगा कभी न कभी । 


भले ही भारत का फुटबॉल मैच आप देखते नहीं होंगे पर                                                                                      इनका नाम हर कोई जानता है। 


और बड़ी बात ये है कि दुनिया भर के बड़े फुटबॉलर रोनाल्डो और मेसी जितना गोल दागे हैं, उतना ये भी दाग चुके हैं, पर इनको कम उम्र कम अंतराष्ट्रीय अवसर मिले, कम प्रतिस्पर्धा मिला जिसके वजह से आज बड़े खिलाड़ियों जितना लोकप्रियता नहीं है। 


अभी फिलहाल ही इन्होंने भारत को एक ऐतिहासित जीत दिलाई थी, तब फिर से सुर्खियों में आ गए थे।और लोग भारतीय फुटबॉल को अलग नजरिये से देखने लगे थे। चलिए कुछ खास जानते हैं।



सुनील छेत्री एक भारतीय पेशेवर फुटबॉलर हैं, जो फॉरवर्ड के रूप में खेलते हैं. वह इंडियन सुपर लीग क्लब बेंगलुरु और भारत की राष्ट्रीय टीम  दोनों की कप्तानी करते हैं।


छेत्री सक्रिय खिलाड़ियों में तीसरा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय गोल करने वाला खिलाड़ी है।


 वह भारत के लिए सर्वाधिक कैप्ड खिलाड़ी और सर्वकालिक शीर्ष गोल करने वाले खिलाड़ी भी हैं।


छेत्री ने 2002 में मोहन बागान में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की. बाद में वह जेसीटी में चले गए जहां उन्होंने 48 खेलों में 21 गोल किए. सुनील दिल्ली में आयोजित संतोष ट्रॉफी के 59वें संस्करण में दिल्ली टीम का हिस्सा थे. उन्होंने उस टूर्नामेंट में गुजरात के खिलाफ हैट्रिक समेत 6 गोल दागे थे. क्वार्टर फाइनल में दिल्ली केरल से हार गई और उसने उस मैच में भी गोल किया. उन्होंने 2010 में कैनसस सिटी विजार्ड्स के मेजर लीग सॉकर पक्ष के लिए हस्ताक्षर किए, विदेश जाने वाले नोट के उपमहाद्वीप से तीसरे खिलाड़ी बन गए. वह भारत के आई-लीग में लौटे, जहां उन्होंने चिराग युनाइटेड और मोहन बागान के लिए ,...


छेत्री को उनकी उत्कृष्ट खेल उपलब्धि के लिए 2011 में अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award) मिला, भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, 2019 में पद्मश्री पुरस्कार (Padma Shri), 2021 में, उन्हें भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान, खेल रत्न पुरस्कार (Khel Ratna Award) मिला. यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले फुटबॉलर हैं ।



दिसंबर 2017 को, छेत्री ने अपनी लंबे समय की प्रेमिका सोनम भट्टाचार्य से शादी की, जो पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय और मोहन बागान के खिलाड़ी
सुब्रत भट्टाचार्य
की बेटी हैं (Sunil Chhetri Wife).


Monday, 24 July 2023

प्रयागराज

अगर पुराने जमाने की नगर देवता की और ग्राम देवता की कल्पनाये आज भी मान्य होती 
तो मै कहता की इलाहाबाद का नगर देवता जरूर कोई रोमांटिक कलाकार है ऐसा लगता है 
इस शहर की बनावट, गठन,ज़िंदगी और रहन-सहन मे कोई बंधे - बँधाये नियम नही है , 
कही कोई कसाव नही है , हर जगह  एक स्वछंद खुलाव ,एक बिखरी हुये सी अनियमितता 
बनारस की गलियो से भीं पतली गलिया और लखनऊ की सड़कों से चौड़ी सड़के। यार्कशायर 
और ब्राइटन के उपनगरो का मुक़ाबला करने वाले सिविल लाइंस और दलदलों की गंदगी को
मात  करने वाले मुहल्ले । मौसम  मे भी कोई सम नही , कोई संतुलन नही ।

  सुबहे मलयजी ,
दोपहरे अंगारी , तो शामे रेशमी !धरती ऐसी की सहारा की रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले ,
मालवा की तरह हरे भरे खेत भी मिले और ऊसर और परती की भी कोई कमी नही ।  सचमुच 
लगता है प्रयाग का नगर देवता स्वर्ग की कुंजियों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है
जिसके सृजन मे हर रंग के डोरे है । 
और चाहे जो हो मगर इधर क्वार-कार्तिक तथा उधर बसंत के बाद और होली के बीच के मौसम 
से इलाहाबाद का वातावरण नईत्सशीर्यम और पैनजी के फूलो से भी ज्यादा खूबसूरत और 
आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है । सिविल लाइंस हो या अल्फ्रेड पार्क ,
गंगातट हो या खुसरूबाग लगता है की हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियो के आँचल 
और लहरों  के मिजाज से छेङ्खनी करती चलती है और अगर आप सर्दी से बहुत  नही डरते तो ☝
आप जरा एक ओवेरकोट डालकर सुबह सुबह घूमने निकाल जाए। 
प्रयागराज
प्रयागराज

 
तो इन खुली हुई जगहो की फिजा इठलाकर आपको अपने जादू मे बांध लेगी ।खासतौर से 
पौ फटने के पहले तो आपको एक बिलकुल नई अनुभूति होगी । बसंत के नये नये मौसमी 
फूलो के रंग से  मुक़ाबला करने वाली हल्की सुनहली , बाल सूर्य की अंगुलिया , सुबह की
 राजकुमारी के  गुलाबी वक्ष पर  बिखरे हुये भौराले गेसूओ को धीरे धीरे हटाती जाती है और 
क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है ।
                                                                   ----चर्चित  

Wednesday, 26 January 2022

मैं हूं साड़

मैं सांड़ हूं , लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारी फसल उजाड़ रहा हूँ , सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ ,मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया,मे तो हजारो वर्षो से तुम्हारे पूर्वजों की सेवा करता आया हू ! मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया ।


अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे ,चारा देते थे , लेकिन मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया ट्रैक्टर ले आया ,पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा और मुझे खुला छोड़ दिया , मैं कहाँ जाता ? कहाँ चरता ? मनुष्य ने चरागाहों पर कब्जा कर लिया , अब पापी पेट का सवाल है  अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया ।
यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया ,मैं फिर भी चुप रहा ,चलो किसी काम तो आया तुम्हारे ।मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया ।
इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया , लेकिन जब मैं अपना पेट भरने गलती से उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे , शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता ।
मित्र बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा ,थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा , रहट से पानी निकाल दूंगा , गाड़ी से सामान ढो दूंगा , बस मुझे अपना लो 
लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा ?
अरे तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो , फिर मेरी क्या औकात..??

1857 की क्रांति का इतिहास

  1857 की क्रांति का इतिहास 1857 की क्रांति, जिसे भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश औपन...