-भगत सिहं
आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में एक स्कूल टीचर नें श्रीकाकुलम आंदोलन के दौरान हुए नुकसान का आकलन किया।
कोंडापल्ली सीतारमैया-इन्होंने तेलंगाना आंदोलन में हिस्सा लिया था लेकिन सी पी आई के विभाजन के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी।इसके बाद जब चारू मजूमदार ने सीी पी आई (एमएल) का गठन किया, तो
सीता रमैया भी इसमें अपने एक अन्य सहयोगी के जी सत्यमूर्ति के साथ शामिल हुए।जिनकी कविता के क्षेत्र में काफी ख्याति थी।
1969 में ही जिस समय देश के अनेक हिस्सों में विद्रोह की लपटें फैल रही थी,सितारामैया ने ककाती मेडिकल कॉलेज से चैनुस राम रेड्डी के रूप में एक व्यक्ति के दस्ते को वारंगल के मुल्लुगू के जंगलों में भेजा।
तेलंगाना के अनुभवों से सीतारमैया ने यह सबक हासिल किया था की जब तक एक सुरक्षित आधार ना तैयार कर लिया जाए जहां छापामारो को प्रशिक्षण दिया जा सके। और जो विद्रोहियों के लिए आश्रय स्थल का काम करें। तब तक लड़ाई करना संभव नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखकर चैनुस राम रेड्डी को मुल्लुगू के जंगलों में भेेेजा गया था।रेड्डी से कहा गया था कि वह इलाके केे लोगों के साथ रहे और उन्हें धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाए।लेकिन किसी समर्थन प्रणाली के अभाव में वह लंबे समय तक वहां ठीक नहीं सका और कुछ हासिल किए बिना उसेे लौटना पड़़ा ।
सीतारमैया यह बात समझ में आ गई कि उसे क्यों वापस आना पड़ा।उन्होंने अब "खुले" जन संगठनों के महत्व को समझना शुरू किया लेकिन यह एक ऐसी बात थी जिसका चारू मजूमदार जबरदस्त विरोध करते थे ।1970 में आयोजित सीपीआई(एम एल)की कांग्रेस में चारू मजूमदार ने स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी का कोई भी खुला स्वरूप नहीं होगा। लेेेकिन अब सीतारमैया केे सामने यह बात साफ हो गई थी कि इस तरह का संगठन होना जरूरी है ।वरवरा राव का कहना है कि 'सीतारमैैैया के खूबियों में एक खूबी यह थी की पहले वह आपकी बात पूरी तन्मयताा से सुनते थे और उसके बाद जवाबी टिप्पणी देते हुए आपको अपनी बात सेेे सहमत कराते थे'। चारु मजूमदार की लाइन का पहला उल्लंघन तब हुआ जब आंध्र प्रदेश में क्रांतिकारी लेखक संगठन (रिवॉल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन) की स्थापना हुई। इसके बाद 1972 में जन नाट्य मंडली का गठन किया गया। पिल्लापु नामक पत्रिका में चारू मजूमदार ने सीतारमैया के नाम एक संदेश भेेेेेजा। जिसमेंं कहा गया थाा कि 'आप लेखक संघ की शुरुआत कर रहे हैं इस पत्रिका के जरिए मैं आपको एक संदेश भेज रहा हूं:। यह बलिदान देने का समय है।'
इस संदेश का यह स्पष्ट अर्थ था कि मजूमदार ने मोर्चा संगठनों के गठन की सीतारमैया की नीति को स्वीकार कर लिया था।लगभग इन्हीं दिनों हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय और वारंगल के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज के अनेक छात्र क्रांतिकारी नीति की ओर आकर्षित हुए ।1974-75 में उस्मानिया विश्वविद्यालय के 14 छात्रों ने संकल्प किया कि वे अपना परिवार नहीं बसायेंगे और अपना पूरा जीवन जनता की क्रांति के लिए समर्पित कर देंगे।इस अवधि में गुंटुर,तिरुपति और विशाखापट्टनम जैसे स्थानों से 40 अन्य लोग भूमिगत हो गए। इसी के आसपास सीतारमैैैया ने यह भी निश्चय किया कि अन्य 'खुलें' संगठनों का निर्माण किया जााए। 12 अक्टूबर 1974 को रेडिकल स्टूडेंट यूनियन(आर एस यू) की स्थापना हुई और इसका पहलाा राज्य सम्मेलन फरवरी 1975 में हैदराबाद में आयोजित किया गया।जिसमेंं रणनीति तैयार की गयीी की किस तरह छात्रों के आंदोलनों का संबंध क्रांति के विचार से जोड़ा जाए इस सम्मेलन में हजारोंं की संख्या में छात्रों नेे हिस्सा लिया ।हिस्सा लेने वाले छात्रों में सबसे बड़ा समूह तेलंगाना काा था।
उन दिनों इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी उनकी राजनीतिक घपलेबाजी की वजह से 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी गई। आर एस यू जैसेेे 'खुले' संगठनों को दमनकारी तंत्र का शिकार होनाा पड़ा। सैकड़ोंं की तादाद में छात्रों को गिरफ्ताार किया गयाा। उन्हेंं यंत्रणा दी गई और फिर जेलों में डाल दिया गया।
चार युवा छात्रों जनार्दन,मुरली,आनंद और को जंगल में ले जाकर पुलिस द्वारा गोलियों से उड़ाा दिया दिया गया।इन सबके बावजूद आंध्र प्रदेश केे सभी कालेजों और विश्वविद्यालयोंं मे आर एस यू की गतिविधियां जारी रही।
इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1978 में एक अन्य संगठन रेडिकल यूथ लीग की स्थापना हुई।जन नाट्य मंडली और आर एस यू के साथ साथ आर वाई एल के सदस्यों ने भी एक आंदोलन की शुरुआत की ।जिसे गांव चलो अभियान कहा गया सीतारमैया ने इस तरीके का इजाद यह सोचकर किया था कि इससे विद्रोही छात्रों को किसानों के साथ घुलने मिलने का अवसर मिलेगा।पार्टी के एजेंडे को किसानों के बीच ले जाने का यह अत्यंत कारगर तरीका था।
गांव में चलाए जा रहे इस अभियान के दौरान छात्र नेता ग्रामीण लोगों को राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाते और ग्रामीण समाज में जमीन आधारित संबंधों के बारे में जानकारियां जूटाते थे। वे यह भी पता करते कि उन ग्रामीणों के बीच ऐसे कौन लोग हैं जिनके अंदर कुशल कार्यकर्ता बनने की संभावना है। इसके बाद इन नामों को केंद्रीय संगठन कर्ता को दे दिया जाता है। केंद्रीय संगठन कर्ता पर उक्त इलाके की जिम्मेदारी होती थी और वह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता था। छापामार ढांचे में उन दिनों एक दस्ते में सीओ और उसके दो अंगरक्षक होते थे और यह सभी पूरी तरह हथियारों से लैस रहते थे।
यह एक सच्चाई है कि माओवाद प्रभावित अनेक इलाकों में सुरक्षाबलों का मनोबल गिरा हुआ है।लेकिन फिर भी समूचे, लाल क्षेत्र में माओवादियों के खिलाफ कार्यवाही चल रही हैै। राज्य की शक्तियां जहां संभव होता है माओवादियों पर प्रहार करती हैं और माओवादियों को जहां मौका मिलता है पलट कर प्रहार करते हैं।
एक खूनी लड़ाई जारी है





Nice
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