Thursday, 27 July 2023

मणिपुर हिंसा

                                            

  "अफीम" एक अत्यधिक नशे की लत वाली मादक दवा को संदर्भित करता है जो अफीम पोस्ता के सूखे लेटेक्स से प्राप्त होती है। (Papaver somniferum). अफीम में मॉर्फिन और कोडीन सहित विभिन्न एल्कलॉइड होते हैं, जिनमें शक्तिशाली दर्द निवारक और शामक प्रभाव होते हैं। इसका उपयोग सदियों से औषधीय और मनोरंजन दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है।


मॉर्फिन, अफीम के प्राथमिक घटकों में से एक, एक शक्तिशाली दर्दनाशक है और गंभीर दर्द को प्रबंधित करने के लिए चिकित्सा सेटिंग्स में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। हालाँकि, इसमें दुर्व्यवहार और लत की उच्च संभावना भी है। कोडीन, अफीम में पाया जाने वाला एक अन्य क्षारीय पदार्थ, मॉर्फिन की तुलना में कम शक्तिशाली है, लेकिन फिर भी इसका उपयोग दर्द निवारक और खांसी दबाने वाले के रूप में किया जाता है।


पूरे इतिहास में अफीम और उसके व्युत्पन्न पदार्थों का समाजों और संस्कृतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। 19वीं शताब्दी में, चीन और पश्चिमी शक्तियों, विशेष रूप से ब्रिटेन के बीच अफीम के युद्ध अफीम के व्यापार को लेकर लड़े गए थे। अफीम की लत के नकारात्मक सामाजिक और स्वास्थ्य परिणामों ने इसके उपयोग को नियंत्रित करने और वैकल्पिक दर्द प्रबंधन दवाओं के विकास के प्रयासों को प्रेरित किया।


आज, अफीम में पाए जाने वाले कई शक्तिशाली यौगिक, जैसे कि मॉर्फिन और कोडीन, का उपयोग विभिन्न दर्द दवाओं के आधार के रूप में किया जाता है, दोनों अपने प्राकृतिक रूप में और संश्लेषित रूपों में। दुरुपयोग और लत की संभावना के कारण इन दवाओं को सख्ती से नियंत्रित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, चिकित्सा उद्देश्यों के लिए इन पदार्थों के उपयोग और दुरुपयोग और निर्भरता के जोखिमों के साथ उनके लाभों को संतुलित करने की आवश्यकता के बारे में चर्चा चल रही है।

मणिपुर में अफीम की खेती भी मुख्य कारण।

 मणिपुर में बसी एक विदेशी मूल की जाति कुकी है, जो मात्र डेढ़ सौ वर्ष पहले पहाड़ों में आ कर बसी थी। ये मूलतः मंगोल नश्ल के लोग हैं। जब अंग्रेजों ने चीन में अफीम की खेती को बढ़ावा दिया तो उसके कुछ दशक बाद अंग्रेजों ने ही इन मंगोलों को वर्मा के पहाड़ी इलाके से ला कर मणिपुर में अफीम की खेती में लगाया। आपको आश्चर्य होगा कि तमाम कानूनों को धत्ता बता कर ये अब भी अफीम की खेती करते हैं और कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इनके व्यवहार में अब भी वही मंगोली क्रूरता है, और व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध का भाव है। मतलब नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे।


    अधिकांश कुकी यहाँ अंग्रेजों द्वारा बसाए गए हैं, पर कुछ उसके पहले ही रहते थे। उन्हें वर्मा से बुला कर मैतेई राजाओं ने बसाया था। क्यों? क्योंकि तब ये सस्ते सैनिक हुआ करते थे। सस्ते मजदूर के चक्कर में अपना नाश कर लेना कोई नई बीमारी नहीं है। आप भी ढूंढते हैं न सस्ते मजदूर? खैर...

    आप मणिपुर के लोकल न्यूज को पढ़ने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि कुकी अब भी अवैध तरीके से वर्मा से आ कर मणिपुर के सीमावर्ती जिलों में बस रहे हैं। सरकार इस घुसपैठ को रोकने का प्रयास कर रही है, पर पूर्णतः सफल नहीं है।

    आजादी के बाद जब उत्तर पूर्व में मिशनरियों को खुली छूट मिली तो उन्होंने इनका धर्म परिवर्तन कराया और अब लगभग सारे कुकी ईसाई हैं। और यही कारण है कि इनके मुद्दे पर एशिया-यूरोप सब एक सुर में बोलने लगते हैं।

     इन लोगों का एक विशेष गुण है। नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे। क्या सरकार, क्या सुप्रीम कोर्ट? अपुनिच सरकार है! "पुष्पा राज, झुकेगा नहीं साला" 


     सरकार कहती है, अफीम की खेती अवैध है। ये कहते हैं, "तो क्या हुआ? हम करेंगे।" कोर्ट ने कहा, "मैतेई भी अनुसूचित जाति के लोग हैं।" ये कहते हैं, "कोर्ट कौन? हम कहते हैं कि वे अनुसूचित नहीं हैं, मतलब नहीं हैं। हमीं कोर्ट हैं। 

 


  मैती, मैतेई या मैतई... ये मणिपुर के मूल निवासी हैं। सदैव वनवासियों की तरह प्राकृतिक वैष्णव जीवन जीने वाले लोग। पुराने दिनों में सत्ता इनकी थी, इन्हीं में से राजा हुआ करते थे। अब राज्य नहीं है, जमीन भी नहीं है। मणिपुर की जनसंख्या में ये आधे से अधिक हैं, पर भूमि इनके पास दस प्रतिशत के आसपास है। उधर कुकीयों की जनसंख्या 30% है, पर जमीन 90% है।

     90% जमीन पर कब्जा रखने वाले कुकीयों की मांग है कि 10% जमीन वाले मैतेई लोगों को जनजाति का दर्जा न दिया जाय। वे लोग विकसित हैं, सम्पन्न हैं। यदि उनको यदि अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया तो हमारा विकास नहीं होगा। हमलोग शोषित हैं, कुपोषित हैं...   कितनी अच्छी बात है न?


     अब मैतेई भाई बहनों की दशा देखिये। जनसंख्या इनकी अधिक है, विधायक इनके अधिक हैं, सरकार इनके समर्थन की है। पर कोर्ट से आदेश मिलने के बाद भी ये अपना हक नहीं ले पा रहे हैं। क्यों? इसका उत्तर समझना बहुत कठिन नहीं है।

     

Wednesday, 26 July 2023

सुनील छेत्री : The Footballer

 क्या आप इन्हें जानते हैं ?? विराट कोहली से कम प्रशंसक हैं इस शक़्स के । पर काम ये भी वैसा ही करते हैं अपने देश के लिए , जैसा क्रिकेट के खिलाड़ी करते हैं 



ये हैं हमारे देश के फुटबॉल खिलाड़ी सुनील क्षेत्री नाम तो सुना ही होगा कभी न कभी । 


भले ही भारत का फुटबॉल मैच आप देखते नहीं होंगे पर                                                                                      इनका नाम हर कोई जानता है। 


और बड़ी बात ये है कि दुनिया भर के बड़े फुटबॉलर रोनाल्डो और मेसी जितना गोल दागे हैं, उतना ये भी दाग चुके हैं, पर इनको कम उम्र कम अंतराष्ट्रीय अवसर मिले, कम प्रतिस्पर्धा मिला जिसके वजह से आज बड़े खिलाड़ियों जितना लोकप्रियता नहीं है। 


अभी फिलहाल ही इन्होंने भारत को एक ऐतिहासित जीत दिलाई थी, तब फिर से सुर्खियों में आ गए थे।और लोग भारतीय फुटबॉल को अलग नजरिये से देखने लगे थे। चलिए कुछ खास जानते हैं।



सुनील छेत्री एक भारतीय पेशेवर फुटबॉलर हैं, जो फॉरवर्ड के रूप में खेलते हैं. वह इंडियन सुपर लीग क्लब बेंगलुरु और भारत की राष्ट्रीय टीम  दोनों की कप्तानी करते हैं।


छेत्री सक्रिय खिलाड़ियों में तीसरा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय गोल करने वाला खिलाड़ी है।


 वह भारत के लिए सर्वाधिक कैप्ड खिलाड़ी और सर्वकालिक शीर्ष गोल करने वाले खिलाड़ी भी हैं।


छेत्री ने 2002 में मोहन बागान में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की. बाद में वह जेसीटी में चले गए जहां उन्होंने 48 खेलों में 21 गोल किए. सुनील दिल्ली में आयोजित संतोष ट्रॉफी के 59वें संस्करण में दिल्ली टीम का हिस्सा थे. उन्होंने उस टूर्नामेंट में गुजरात के खिलाफ हैट्रिक समेत 6 गोल दागे थे. क्वार्टर फाइनल में दिल्ली केरल से हार गई और उसने उस मैच में भी गोल किया. उन्होंने 2010 में कैनसस सिटी विजार्ड्स के मेजर लीग सॉकर पक्ष के लिए हस्ताक्षर किए, विदेश जाने वाले नोट के उपमहाद्वीप से तीसरे खिलाड़ी बन गए. वह भारत के आई-लीग में लौटे, जहां उन्होंने चिराग युनाइटेड और मोहन बागान के लिए ,...


छेत्री को उनकी उत्कृष्ट खेल उपलब्धि के लिए 2011 में अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award) मिला, भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, 2019 में पद्मश्री पुरस्कार (Padma Shri), 2021 में, उन्हें भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान, खेल रत्न पुरस्कार (Khel Ratna Award) मिला. यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले फुटबॉलर हैं ।



दिसंबर 2017 को, छेत्री ने अपनी लंबे समय की प्रेमिका सोनम भट्टाचार्य से शादी की, जो पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय और मोहन बागान के खिलाड़ी
सुब्रत भट्टाचार्य
की बेटी हैं (Sunil Chhetri Wife).


Monday, 24 July 2023

प्रयागराज

अगर पुराने जमाने की नगर देवता की और ग्राम देवता की कल्पनाये आज भी मान्य होती 
तो मै कहता की इलाहाबाद का नगर देवता जरूर कोई रोमांटिक कलाकार है ऐसा लगता है 
इस शहर की बनावट, गठन,ज़िंदगी और रहन-सहन मे कोई बंधे - बँधाये नियम नही है , 
कही कोई कसाव नही है , हर जगह  एक स्वछंद खुलाव ,एक बिखरी हुये सी अनियमितता 
बनारस की गलियो से भीं पतली गलिया और लखनऊ की सड़कों से चौड़ी सड़के। यार्कशायर 
और ब्राइटन के उपनगरो का मुक़ाबला करने वाले सिविल लाइंस और दलदलों की गंदगी को
मात  करने वाले मुहल्ले । मौसम  मे भी कोई सम नही , कोई संतुलन नही ।

  सुबहे मलयजी ,
दोपहरे अंगारी , तो शामे रेशमी !धरती ऐसी की सहारा की रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले ,
मालवा की तरह हरे भरे खेत भी मिले और ऊसर और परती की भी कोई कमी नही ।  सचमुच 
लगता है प्रयाग का नगर देवता स्वर्ग की कुंजियों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है
जिसके सृजन मे हर रंग के डोरे है । 
और चाहे जो हो मगर इधर क्वार-कार्तिक तथा उधर बसंत के बाद और होली के बीच के मौसम 
से इलाहाबाद का वातावरण नईत्सशीर्यम और पैनजी के फूलो से भी ज्यादा खूबसूरत और 
आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है । सिविल लाइंस हो या अल्फ्रेड पार्क ,
गंगातट हो या खुसरूबाग लगता है की हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियो के आँचल 
और लहरों  के मिजाज से छेङ्खनी करती चलती है और अगर आप सर्दी से बहुत  नही डरते तो ☝
आप जरा एक ओवेरकोट डालकर सुबह सुबह घूमने निकाल जाए। 
प्रयागराज
प्रयागराज

 
तो इन खुली हुई जगहो की फिजा इठलाकर आपको अपने जादू मे बांध लेगी ।खासतौर से 
पौ फटने के पहले तो आपको एक बिलकुल नई अनुभूति होगी । बसंत के नये नये मौसमी 
फूलो के रंग से  मुक़ाबला करने वाली हल्की सुनहली , बाल सूर्य की अंगुलिया , सुबह की
 राजकुमारी के  गुलाबी वक्ष पर  बिखरे हुये भौराले गेसूओ को धीरे धीरे हटाती जाती है और 
क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है ।
                                                                   ----चर्चित  

Wednesday, 26 January 2022

मैं हूं साड़

मैं सांड़ हूं , लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारी फसल उजाड़ रहा हूँ , सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ ,मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया,मे तो हजारो वर्षो से तुम्हारे पूर्वजों की सेवा करता आया हू ! मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया ।


अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे ,चारा देते थे , लेकिन मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया ट्रैक्टर ले आया ,पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा और मुझे खुला छोड़ दिया , मैं कहाँ जाता ? कहाँ चरता ? मनुष्य ने चरागाहों पर कब्जा कर लिया , अब पापी पेट का सवाल है  अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया ।
यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया ,मैं फिर भी चुप रहा ,चलो किसी काम तो आया तुम्हारे ।मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया ।
इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया , लेकिन जब मैं अपना पेट भरने गलती से उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे , शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता ।
मित्र बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा ,थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा , रहट से पानी निकाल दूंगा , गाड़ी से सामान ढो दूंगा , बस मुझे अपना लो 
लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा ?
अरे तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो , फिर मेरी क्या औकात..??

Monday, 17 January 2022

मैं हु उत्तर प्रदेश

मैं हूँ उत्तर प्रदेश l नाम तो मेरा सुना ही होगा l देश की उत्तर दिशा में बसता हूँ मैं l मेरे पूर्व में बिहारझारखण्ड, पश्चिम में हरियाणा और दिल्ली, उत्तर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तथा दक्षिण में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य हैं l  की सबसे अधिक जनसँख्या (लगभग २५ करोड़) वाला राज्य मैं ही हूँ l यही वजह है कि यहाँ होने वाले घटनाक्रमों का सीधा असर दिल्ली तक होता है
यह मेरा सौभाग्य है कि प्रकृति ने मुझे भरपूर प्रेम और ममता प्रदान की l उत्तराखंड से निकलने वाली गंगा, यमुना, रामगंगा  मेरी धरा को अपने अमृत से सींचते हुए, मैदानों को उपजाऊ बनाती हैं l घाघरा, चम्बल, बेतवा, सोन, गंडक, सरयू नदियों से सिंचित  क्षेत्रों में भरपूर अन्न का उत्पादन होता है l चावल, मक्का, गेंहूं, मटर, सरसों के साथ गन्ना सबसे अधिक पैदा होने वाली फसल है l 
मेरे अंदर ७५ जिले बसते हैं, जिसमें लखीमपुर सबसे बड़ा जिला है l मेरी पुरानी पहचान “अवध” को अब तक संभाले हुए है मेरा दिल यानी लखनऊ, जो मेरी राजधानी भी है l गंगा- जमुनी संस्कृति की धरोहर को समेटे यह शहर कला और शिल्प का नायाब उदाहरण है l भूलभुलैया, रूमी दरवाजा, घंटाघर, इमामबाड़ा मुग़ल स्थापत्य कला के आकर्षक नमूने हैं तो ,आगरा का ताजमहल इस कला का सिरमौर , जिसने विश्व भर को सम्मोहित कर रखा है l गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन का साक्षी है प्रयागराज, जहाँ स्नान करने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं और संगम में डुबकी लगा कर तृप्त हो जाते हैं l 
यदि मैं वाराणसी का जिक्र न करूं तो बात अधूरी रह जाएगी l सारनाथ, काशी विश्वनाथ मंदिर और प्रसिद्ध गंगा घाट लोगों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं l और अब तो मेरे अस्तित्व को प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है l यह सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, अपितु पूरे देश के लिए सम्मानित कदम है l ऐसे ही मथुरा, वृन्दावन,, दुधवा टाइगर रिज़र्व …….अनगिनत स्थान हैं जिन्होंने मेरी साख बढ़ाई है l 

मेरे यहाँ बनने वाले पकवानों का स्वाद तो विश्व भर में लोगो की जुबान पर है l चाहे वह लखनऊ के टुंडे के कबाब हो, मलीहाबाद के दशहरी आम, प्रयागराज की गरमागरम जलेबी- रबड़ी, बलिया का लिट्टी चोखा, मथुरा के पेड़े, आगरा का पेठा, बटोही के रसगुल्लों के साथ मेरी गुझिया, रसमलाई, कुल्फी, खीर और बनारसी पान तो लाजवाब है l मेरे व्यंजनों ने तो सबको चटखारे लेने पर मजबूर कर दिया है l 

 अपने यहाँ की कलाओं के बारे में मैं क्या कहूं, हर कोई इनका मुरीद है l 
मेरे यहाँ विकसित हुई चिकनकारी ने तो पूरी दुनिया में मेरी शान बढ़ाई है l मलमल के कपड़ों पर रंगीन धागों के महीन जाल में सभी बंध कर रह गए हैं l 
किसी भी नवयौवना के विवाह की तैयारी बनारस की बनारसी साड़ियों के बगैर पूरी नहीं होती है तो फिरोजाबाद की रंग बिरंगी कांच की चूड़ियां अनगिनत कलाईयों पर सजती हैं l मुरादाबाद के पीतल के बर्तन, खुर्जा के मिटटी के बर्तन लोगों की पहली पसंद हैं तो भदोही और मिर्ज़ापुर के खूबसूरत कालीन की जादुई दुनिया से भला कौन बच सका है l 

  मेरे रग रग में बसी है कला l कत्थक, रसिया, चारकुला और ब्रज रासलीला ने जगह जगह मेरी संस्कृति का रंग बिखराया है l उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, बिरजू महाराज, चंदू महाराज, तीजनबाई ….न जाने कितने ही कलाकारों ने विदेशों तक मेरे नाम की धूम मचाई है l मुंशी प्रेमचंद, कबीरदास , तुलसी दास, सूरदास, जय शंकर प्रसाद,महादेवी वर्मा , मैथिली शरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन, भारतेंदु हरिश्चंद जैसे प्रकांड साहित्यकारों ने राज्य भाषा हिंदी को अपनी लेखनी से उन्नति के चरम शिखर तक पहुँचाया है l इंदिरा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर आज़ाद, अमिताभ बच्चन सहित बहुत सारी हस्तियों ने अपनी कुशल प्रतिभा से मेरी गरिमा में चार चाँद लगाया है lयहाँ पर पंडित मोतीलाल नेहरु, पंडित जवाहर लाल नेहरु, पुरषोत्तम दास टंडन, लाल बहादुर शास्त्री, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, राजीव गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रतिष्ठित राजनेताओं ने देश की राजनीति में महतवपूर्ण भूमिका निभायी l यही वजह है की दिल्ली तक पहुँचने का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है l यही मेरा परिचय है l 
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Saturday, 19 June 2021

वसंत के वज्रनाद की वापसी

क्रांति को संपन्न करना किसी भी व्यक्ति की ताकत से परे है।इसे किसी निर्धारित तारीख पर भी नहीं संपन्न किया जा सकता।इसे विशेष सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ही संपन्न किया जा सकता है।एक संगठित पार्टी का काम यह है कि वह ऐसी परिस्थितियों द्वारा प्रस्तुत किसी भी अवसर का इस्तेमाल करें।
                                                  -भगत सिहं



आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में एक स्कूल टीचर नें श्रीकाकुलम आंदोलन के दौरान हुए नुकसान का आकलन किया। 
कोंडापल्ली सीतारमैया-इन्होंने तेलंगाना आंदोलन में हिस्सा लिया था लेकिन सी पी आई के विभाजन के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी।इसके बाद जब चारू मजूमदार ने  सीी पी आई (एमएल) का गठन किया, तो 
सीता रमैया भी इसमें अपने एक अन्य सहयोगी के जी सत्यमूर्ति के साथ शामिल हुए।जिनकी कविता के क्षेत्र में काफी ख्याति थी।


        1969 में ही जिस समय देश के अनेक हिस्सों में विद्रोह की लपटें फैल रही थी,सितारामैया ने ककाती मेडिकल कॉलेज से चैनुस राम रेड्डी के रूप में एक व्यक्ति के दस्ते को वारंगल के मुल्लुगू के जंगलों में भेजा।
तेलंगाना के अनुभवों से सीतारमैया ने यह सबक हासिल किया था की जब तक एक सुरक्षित आधार ना तैयार कर लिया जाए जहां छापामारो को प्रशिक्षण दिया जा सके। और जो विद्रोहियों के लिए आश्रय स्थल का काम करें। तब तक लड़ाई करना संभव नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखकर चैनुस राम रेड्डी को मुल्लुगू के जंगलों में भेेेजा गया था।रेड्डी से कहा गया था कि वह इलाके केे लोगों के साथ रहे और उन्हें धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाए।लेकिन किसी समर्थन प्रणाली के अभाव में वह लंबे समय तक वहां ठीक नहीं सका और कुछ हासिल किए बिना उसेे लौटना पड़़ा ।
        सीतारमैया यह बात समझ में आ गई कि उसे क्यों वापस आना पड़ा।उन्होंने अब "खुले" जन संगठनों के महत्व को समझना शुरू किया लेकिन यह एक ऐसी बात थी जिसका चारू मजूमदार जबरदस्त विरोध करते थे ।1970 में आयोजित सीपीआई(एम एल)की कांग्रेस में चारू मजूमदार ने स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी का कोई भी खुला स्वरूप नहीं होगा। लेेेकिन अब सीतारमैया केे सामने यह बात साफ हो गई थी कि इस तरह का संगठन होना जरूरी है ।वरवरा राव का कहना है कि 'सीतारमैैैया के खूबियों में एक खूबी यह थी की पहले वह आपकी बात पूरी तन्मयताा से सुनते थे और उसके बाद जवाबी टिप्पणी देते हुए आपको अपनी बात सेेे सहमत कराते थे'। चारु मजूमदार की लाइन का पहला उल्लंघन तब हुआ जब आंध्र प्रदेश में क्रांतिकारी लेखक संगठन (रिवॉल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन) की स्थापना हुई। इसके बाद 1972 में जन नाट्य मंडली का गठन किया गया। पिल्लापु नामक पत्रिका में चारू मजूमदार ने सीतारमैया के नाम एक संदेश भेेेेेजा। जिसमेंं कहा गया थाा कि 'आप लेखक संघ की शुरुआत कर रहे हैं इस पत्रिका के जरिए मैं आपको एक संदेश भेज रहा हूं:। यह बलिदान देने का समय है।'


         इस संदेश का यह स्पष्ट अर्थ था कि मजूमदार ने मोर्चा संगठनों के गठन की सीतारमैया की नीति को स्वीकार कर लिया था।लगभग इन्हीं दिनों हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय और वारंगल के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज के अनेक छात्र क्रांतिकारी नीति की ओर आकर्षित हुए ।1974-75 में उस्मानिया विश्वविद्यालय के 14 छात्रों ने संकल्प किया कि वे अपना परिवार नहीं बसायेंगे और अपना पूरा जीवन जनता की क्रांति के लिए समर्पित कर देंगे।इस अवधि में गुंटुर,तिरुपति और विशाखापट्टनम जैसे स्थानों से 40 अन्य लोग भूमिगत हो गए। इसी के आसपास सीतारमैैैया ने यह भी निश्चय किया कि अन्य 'खुलें' संगठनों का निर्माण किया जााए। 12 अक्टूबर 1974 को रेडिकल स्टूडेंट यूनियन(आर एस यू) की स्थापना हुई और इसका पहलाा राज्य सम्मेलन फरवरी 1975 में हैदराबाद में आयोजित किया गया।जिसमेंं रणनीति तैयार की गयीी की किस तरह छात्रों के आंदोलनों का संबंध क्रांति के विचार से जोड़ा जाए इस सम्मेलन में हजारोंं की संख्या में छात्रों नेे हिस्सा लिया ।हिस्सा लेने वाले छात्रों में सबसे बड़ा समूह तेलंगाना काा था। 
उन दिनों इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी उनकी राजनीतिक घपलेबाजी की वजह से 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी गई। आर एस यू जैसेेे 'खुले' संगठनों को दमनकारी तंत्र का शिकार होनाा पड़ा। सैकड़ोंं की तादाद में छात्रों को गिरफ्ताार किया गयाा। उन्हेंं यंत्रणा दी गई और फिर जेलों में डाल दिया गया।
चार युवा छात्रों जनार्दन,मुरली,आनंद और  को जंगल में ले जाकर पुलिस द्वारा गोलियों से उड़ाा दिया दिया गया।इन सबके बावजूद आंध्र प्रदेश केे सभी कालेजों और विश्वविद्यालयोंं मे आर एस यू की गतिविधियां जारी रही।


     इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1978 में एक अन्य संगठन रेडिकल यूथ लीग की स्थापना हुई।जन नाट्य मंडली और आर एस यू के साथ साथ आर वाई एल के सदस्यों ने भी एक आंदोलन की शुरुआत की ।जिसे गांव चलो अभियान कहा गया सीतारमैया ने इस तरीके का इजाद यह सोचकर किया था कि इससे विद्रोही छात्रों को किसानों के साथ घुलने मिलने का अवसर मिलेगा।पार्टी के एजेंडे को किसानों के बीच ले जाने का यह अत्यंत कारगर तरीका था। 

गांव में चलाए जा रहे इस अभियान के दौरान छात्र नेता ग्रामीण लोगों को राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाते और ग्रामीण समाज में जमीन आधारित संबंधों के बारे में जानकारियां जूटाते थे। वे यह भी पता करते कि उन ग्रामीणों के बीच ऐसे कौन लोग हैं जिनके अंदर कुशल कार्यकर्ता बनने की संभावना है। इसके बाद इन नामों को केंद्रीय संगठन कर्ता को दे दिया जाता है। केंद्रीय संगठन कर्ता पर उक्त इलाके की जिम्मेदारी होती थी और वह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता था। छापामार ढांचे में उन दिनों एक दस्ते में सीओ और उसके दो अंगरक्षक होते थे और यह सभी पूरी तरह हथियारों से लैस रहते थे।
यह एक सच्चाई है कि माओवाद प्रभावित अनेक इलाकों में सुरक्षाबलों का मनोबल गिरा हुआ है।लेकिन फिर भी समूचे, लाल क्षेत्र में माओवादियों के खिलाफ कार्यवाही चल रही हैै। राज्य की शक्तियां जहां संभव होता है माओवादियों पर प्रहार करती हैं और माओवादियों को जहां मौका मिलता है पलट कर प्रहार करते हैं।

                 एक खूनी लड़ाई जारी है

Wednesday, 16 June 2021

राजमाता जीजाबाई

           
जीजाबाई (1594-1674) महान मराठा शासक और योद्धा शिवाजी की माता जी थी।शिवाजी मुगल साम्राज्य के खिलाफ मजबूती से लड़े और हिंदवी स्वराज की स्थापना की। जीजा बाई का जन्म 1594 ई० में महाराष्ट्र के गांव सिंधखेड़ में हुआ था उनके पिता शाही दरबारी और प्रमुख मराठा सरदार थे जिनका नाम लखुजी जाधवराव था, जबकि उनकी माता का नाम म्हालसा बाई था। उनके पिता अहमदनगर में निजामशाही की सेवा करते थे और उन्हें अपने ऊंचे रुतबे और पद पर गर्व थाा। जीजाबाई की शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी।

उस कालखंड के रीति रिवाज के मुताबिक उनका विवाह शाहजी भोंसले से हुआ। शाहजी निजाम शाह के दरबार में राजनयीक पद संभालते थेे। वह एक बेहतरीन योद्धा भी थेे।
शाहजी भोंसले के पिताजी का नाम मालोजी शिलेदार था जो बाद में तरक्की पाते हुए सरदार मालोजी राव भोसले बन गए वैसे तो दंपत्ति का वैवाहिक जीवन बेहद सुखद था लेकिन उनके परिजनों की आपस में टकराहट ने तनाव को जन्म दिया। शाहजी राजे और उनके ससुर जाधव के आपसी रिश्ते बिगड़ गये।


हालात इतने बिगड़ चुके थे जीजाबाई पूरी तरह टूट गई थी। उन्हें अपने पति और पिता मे से एक का पक्ष लेना था उन्होंने पति का साथ दिया।
जीजाबाई अपने पति के साथ शिवनेरी के किले में ही रही।उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई हालांकि,उन्हें इस बात का दुख था कि उनके पिता और पति दोनों किसी और शासक के अधीन काम करते हैं। उनकी इच्छा थी कि मराठों का अपना साम्राज्य स्थापित हो। दोनों की 8 संताने हुयी 2 लड़के और 6 बेटियां शिवाजी उनके दो बेटों में से एक थे। वह हमेशा भगवान से प्रार्थना करती थी कि उन्हें एक ऐसा बेटा मिले जो मराठा साम्राज्य की नींव रख सके। उनकी प्रार्थनाओं का जवाब शिवाजी के तौर पर मिला जिन्होंने मराठा साम्राज्य की स्थापना की।
जीजाबाई को एक प्रभावी और प्रतिबद्ध महिला के तौर पर जाना जाता है। जिसके लिए आत्म सम्मान और उनके मूल्य सर्वोपरि हैं। अपनी दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध जीजाबाई खुद एक योद्धा और प्रशासक थी। उन्होंने बढ़ते शिवाजी में अपने गुणों का संचार किया।शिवाजी में कर्तव्य भावना,साहस और मुश्किल परिस्थितियों का सामना साहस के साथ करने के लिए मूल्यों का संचार किया।उनकी  देख-रेख और मार्गदर्शन में शिवाजी ने मानवीय रिश्तो की अहमियत समझी महिलाओं का मान सम्मान,धार्मिक सहिष्णुता और न्याय के साथ ही अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और महाराष्ट्र की आजादी की इच्छा बलवती हुई।


शिवाजी भी अपने सभी सफलताओं का श्रेय अपनी मां को देते थे,जो उनके लिए प्रेरणास्रोत थीं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे को मराठा साम्राज्य का महानतम शासक बनाने पर लगा दी।
वह शिवाजी और उनके साथियों की सफलता देखकर गर्वित होती थी। जीजा बाई का सपना उस समय पूरा हुआ। जब उनकी आंखों के सामने उनके बेटे का राज्य अभिषेक समारोह संपन्न हुआ। 1674 में शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ और वह मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले महाप्रतापी राजा बने।


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भारत में अशोक राज

अशोक-राज वस्तुतः भारत का स्वर्ण काल था। इसी काल में प्राचीन भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित हुआ। एक भाषा और लिपि से जबरदस्त राष्ट्रीय एकता कायम हुई। इसी काल में धम्म की धमक  पश्चिमी एशिया,उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व यूरोप से लेकर दक्षिण के राज्यों तक सरसरा कर पहुंच गई थी। राज्य भी अहिंसक हो सकता है ।इसकी मिसाल विश्व इतिहास में अशोक-राज ने साबित कर दिया।
    बुद्ध और अशोक भारत की शांति-संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। अशोक-राज में दोनों प्रतीकों का ऐसा मणिकांचन संयोग हुआ कि भारत का गौरव बाइस सौ साल बाद भी धूमिल नहीं हो सका।

     अशोक और उनका परिवार


विश्व इतिहास में सिकंदर,सीजर,नेपोलियन जैसे विजेता हुए मगर किसी को इतिहास में वह स्थान प्राप्त नहीं है ।जो सम्राााट अशोक को प्राप्त है एक ऐसा सम्राट जिन्होंने तलवार का त्याग विजित होने पर नहीं बल्कि विजेता होने पर किया।एच जी वेल्स ने लिखा कि इतिहास में वर्णित हजारों राजाओं और महाराजाओं के बीच देवानंपीय अशोक का नाम एक चमकदार नक्षत्र केे अनुरूप अकेला चमक रहा है। वोल्गा से लेकर जापान तक आज भी उनका नाम  आदर के साथ लिया जाता है। चीन, तिब्बत तथा भारत भी उनके बड़प्पन का बखान करते हैं। प्रणय आलिंगन
अशोक के जमाने में वर्ण-व्यवस्था नहीं थी तब गण-व्यवस्था थी मगर इतिहासकार अशोक को कभी छत्रिय तो कभी शुद्र बताए जाने की खोज में लगे रहते हैं। और निरर्थक इतिहास के पन्ने खर्च करते हैं।जो वर्ण व्यवस्था सम्राट अशोक के समय में नहीं थी उसे खोजने की कोशिश जातिवादी मानसिकता का द्योतक है तब गण व्यवस्था थी और अशोक मौरीय गण से आते थे।मगर इतिहासकार पुराणों को आधार बनाकर उन्हें शुद्र बनाने पर तुले हुए हैं।
सम्राट अशोक की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। कि उनके जीवन की दास्तान संस्कृत,पाली,तिब्बती,चीनी,बर्मी,सिंहल,थाई,लाओ और खेतानी जैसे अनेक भाषा ग्रंथ अपने-अपने ढंग से सुनाते हैं। कोई उनकी मां का नाम सुभद्गरागीं तो कोई धम्मा बताता हैै। उसी प्रकार अशोक की पत्नी का नाम अलग-अलग ग्रथों में अलग-अलग मिलताा है। मगर अशोक की रानी के अभिलेख मेंं उनकी उनकी पत्नी का नाम कालूवाकी मिलता हैै जो तिवल की मां थी। हमारेे यहां तिष्यरक्षिता को लेकर अनेक साहित्य रचे गए ।लेकिन कालूवाकी को लेकर साहित्य में कोई हलचल नहींं है।जबकी कालूवाकी का ही पुरातात्विक सबूत हमारे पास है चूूूँँकि कालूवाकी नाम आर्यमुलक नहींं हैै। इसकी सजा कालूवाकी को साहित्य बाहर कर दी गई।
अशोक के अभिलेखों से अशोक के परिवार के कुछ है सदस्यों का पता चलता है श्रीलंका के एक मामूली स्तूप के एक मामूली पत्थर पर जो अम्पारा जिले के राजगला में स्थित है । इसका प्रमाण मिला है कि महिंद्र थेर श्री लंका गए थे धम्म लिपि और सिंहली भाषा ने लिखा है कि यह स्तूप ईदीका थेर और महींद्र थेर का है, जो इस भूमि के उज्जवल भविष्य के लिए यहां आए थे।
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में पानगुरारिया बौद्ध विहार है पानगुरारिया में दो शिलालेख और एक यष्टी लेख पर अशोक की बेटी संघमित्रा द्वारा दान दिए जाने का विवरण अंकित है।जिससे संघमित्रा के पुरातात्विक ऐतिहासिकता पुष्ट होती है।
सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी। नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तीय से ब्याही गई थी।पति-पत्नी दोनों बुधमार्गी थे ।काठमांडू से सटे चाबहील में चारुवति का स्तूूप है।
अशोक का पहली बार रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मौर्य मिलता है। जूनागढ़ अभिलेख दूसरी सदी का है।जूनागढ़ अभिलेख में लिखा है कि सुदर्शन तालाब मौर्य नरेश चंद्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने बनवाया था अशोक मौर्य के लिए यवनराज तुषास्प ने उसे बड़ी बड़ी नालियों से युक्त किया ।पुराणों में अशोक का नाम अशोक वर्धन मिलता है जो बाद में लिखे गए हैं।अशोक के खुद के शिलालेखों(मास्की गुर्जरा नेत्तूर और उड़ेगोलम)ने उनका नाम अशोक लिखा मिलता है।

राजगद्दी पर बैठने के बाद अशोक ने सिर्फ एक युद्ध किए जो कलिंग युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार है ।अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने आज से कोई ढाई हजार साल पहले पश्चिमोत्तर भारत की उस वैज्ञानिक सीमाओं को प्राप्त कर लिए थे जिस को छूने के लिए आधुनिक काल में अंग्रेज व्यर्थ की आहें भरते रहे। बिंदुसार न्यू इस महान साम्राज्य को बचाए रखा अशोक ने उसे और विस्तार दिया अशोक ने 14 में शिलालेख में स्वयं कहाा है कि मेरा साम्राज्य विस्तृत है अशोक के साम्राज्य की सीमाएं कहां से कहां तक विस्तृत थी इसका पता हमें विभिन्न स्थानों से प्राप्त उनके ही अभिलेखों से पता चलता है दूसरे किसी सबूत की जरूरत नही है ।अशोक का साम्राज्य उत्ततर पश्चिम में हिंदूकुश से पूरब में बंगाल तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में मैसूर तक विस्तृत था कलिंग और सौराष्ट्र पर भी उनका अधििकार था।प्राचीन भारत का कोई सम्राट इतने विस्तृत भूखंड का स्वामी नहीं था।
जिस दार्शनिक और दर्शन की खोज में सम्राट अशोक के पिता यूनान तक अपनी आंखें गड़ाए हुए थे। अशोक की आंखों ने वह दार्शनिक और दर्शन यही भारत में ही खोज निकाले ।उन्होंने गंगा घाटी के धम्म को उठाकर विश्वधम्म का रूप दे डाले। लेनिन ने राजनीति में मार्क्स के सिद्धांतों को लागू किए और अशोक ने राजनीति में बुद्ध के सिद्धांतों को लागू किये और इस सिद्धांत पर चलकर वे दुनिया में वह मुकाम हासिल किए जो कम ही सम्राटों को नसीब हुए सच में अशोक दी ग्रेट साम्राज्य विस्तार के सैनिक-सम्राट थे तो युद्ध की विभीषिका के से आहत संवेदनशील और दुखी मनुष्य भी थेे।
रमेश चंद्र मजूमदार ने लिखा है कि साम्राज्य तो उठते गिरते रहे हैं लेकिन अशोक के माध्यम से भारत के नैतिक विजय को जो गौरव प्राप्त हुआ है उसकी दीप्ति 2000 साल से अधिक समय बीत जाने पर भी धुंधली नहीं हुई है।

Tuesday, 15 June 2021

पं० रामनाथ पाठक

प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पूर्वविधायक स्वपं० रामनाथ पाठक की 26वीं पुण्य तिथि पर कोटिश: नमन।।
अविभाजित जनपद मीरजापुर के ग्राम पसही कलां के मूल निवासी भारत माता के अमर सपूत पूज्य पंडित रामनाथ पाठक जी का जन्म वर्ष 1912 की श्रावण शुक्ला सप्तमी को लसडा गावँ में हुआ था। अल्पायु मे ही इनके पिता की मृत्यु होने से घर- गृहस्थी के दायित्व के साथ-साथ आप देश मे चल रहे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े तथा वाराणसी मंडल मे क्रांतिकारी विचार वाले  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अनुयायियों के साथ आन्दोलन को  गतिमान बनाने में लग गए।
             वर्ष 1936 मे आपने काग्रेस पार्टी की सक्रिय सदस्यता ग्रहण की। स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन मे वर्ष 1941-42 मे आप जेल गए जहाँ इन्हें नजरबंद कर तनहाई मे रखा गया व कठोर यातनाए दी गई।    देश की स्वतंत्रता के पश्चात वर्ष 1962 मे रावर्टसगंज व वर्ष 1967 मे राजगढ विधान सभा से आप दो बार अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से  विधायक रहे तथा जनपद मीरजापुर एवं सोनभद्र मे लोक कल्याण के लिए अविस्मरणीय सेवा की।तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत से प्रयास कर आपने जिले को बुन्देलखण्ड के समान सुविधाओं का लाभ   दिलाया।वर्ष 1952 मे भुखमरी के कारण  हुई मौतों के आधार पर मीरजापुर जिले को अकालग्रस्त घोषित कराना, वर्ष  1954 मे राजकीय सीमेंट फैक्ट्री चुर्क का उदघाटन प्रधानमंत्री  नेहरूजी ने किया था जिस समारोह की अध्यक्षता आपने की थी।
नेहरूजी से आग्रह कर आपने सीमेंट कारखाने मे नौकरी हेतु स्थानीय लोगों को विशेष प्राथमिकता दिलवाई थी जिससे सैकड़ों जनपदवासियो को रोजी-रोटी मिली।जन कल्याण हेतु आपके प्रयास से जसौली मे सिंचाई हेतु नगवा बाॅध से नहरों का निर्माण, दुद्धी तहसील मे लोहा,कोयला व सीमेंट  विक्री हेतु स्थानीय स्तर पर सरकारी दुकानों का आवंटन,रावर्टसगंज को अलग जिला बनाने हेतु विधान सभा मे पहल,प्राथमिक विद्यालयों मे तदर्थ नियुक्ति हेतु मात्र कक्षा 5 उत्तीर्ण स्थानीय लोगों कोअध्यापक बनवाने हेतु तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त द्वारा विशेष  शासनादेश दिलाकर सैकड़ो अध्यापको की नियुक्ति,  वर्ष 1963 मे रिहन्द जल विद्युत परियोजना के शुरू कराने का कार्य,वर्ष 1967 मे प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी जी के साथ भयंकर अकालग्रस्त सम्पूर्ण जिले के दौरे मे उनके  साथ रहकर स्थलीय निरीक्षण करवाया ।जिससे  अनेकों तालाब व सड़कों के निर्माण राहत कार्य द्वारा हुए। 1972 मे हुए मध्यावधि चुनाव में मुख्यमन्त्री कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी  को राजगढ विधान सभा से पहली बार विजयी बनाने मे महती भूमिका निभाई।स्वतंत्रता दिवस  की रजत जयंती पर स्वतंत्रता संग्राम मे देश की स्मरणीय सेवा हेतु 15 अगस्त 1972 को प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने ताम्र पत्र प्रदान कर आपको सम्मानित किया  तथा राज्य व केंद्र  सरकार से आजीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन से मानवर्धन किया ।
 पाठक जी का भरा-पूरा परिवार उनके पुण्य प्रताप से है।आपकी दो पुत्रियां अपने सफल गृहस्थ जीवन का संपूर्ण निर्वहन कर दुर्भाग्यवश अब परलोकवासिनी हुईं व आपके एकमात्र पुत्र डाक्टर श्री मार्कण्डेय राम पाठक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 37 वर्षों की सक्रिय सेवा मे संयुक्त कुल सचिव व वित्त अधिकारी पद से 2017 मे सेवानिवृत्ति के पश्चात ।
अब संयुक्त कुल सचिव विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षाओं के पद पर पुनर्नियोजित है एवं अपने प्रशासनिक गुरूतर दायित्वों का कर्तव्यनिष्ठ सेवाभाव से संपादन कर रहे हैं। पाठक जी की तीनों पौत्रियां शादीशुदा होकर सुखपूर्वक अपनी गृहस्थी में रमी हैं व पाठक के जी के दो पौत्रों में से बड़े पौत्र कौशलेश पाठक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बीए,एल एल बी कर सम्प्रति जिलाध्यक्ष कांग्रेस सेवादल हैं व अपने पूज्य पितामह के पदचिन्हों पर चल रहे हैं। छोटे पौत्र शैलेश पाठक बीएससी (कृषि),एमबीए(एग्रीबिजनेस -गोल्ड मेडल ) सम्प्रति देश की प्रतिष्ठापरक डेयरी -आनन्दा मे उप महाप्रबंधक  पद पर सेवारत हैं। 
ऐसे पुण्यात्मा,देश सेवाव्रत को जीवन पर्यंत मनसा-वाचा-कर्मणा अपनी दिनचर्या में समाहित करने वाले, भारतमाता के अमर सपूत पूज्य पंडित रामनाथ पाठक जी ने जीवन की अंतिम सांस वाराणसी मे 15 जून 1995 को ली एवं उन्हें शिव-सायुज्य मोक्ष मिला।
कीर्तिरयस्य स जीवति। परम पूज्यनीय पाठक जी को 
हमारी  विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

Monday, 14 June 2021

लाल इतिहास की फसल -2

बिहार के जंगलों में 2007 में माओवादियों के कांग्रेस में शामिल हुए विद्रोहियों की तस्वीर

नक्सलबाड़ी की इन घटनाओं पर चीन ने फौरन अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के मुखपत्र पीपुल्स डेली ने अपने संपादकीय में नक्सलबाड़ी की घटनाओं को वसंत का वज्रनाद कहा।
पीपुल्स डेली ने लिखा दार्जिलिंग क्षेत्र के क्रांतिकारी किसानों ने विद्रोह कर दिया है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक क्रांतिकारी समूह के नेतृत्व में ग्रामीण क्रांतिकारी ससस्त्र संघर्ष के एक लाल क्षेत्र की स्थापना भारत में हो गई है। भारतीय जनता के क्रांतिकारी संघर्ष के लिए यह घटना जबरदस्त महत्व रखतीी है।
चारु मजुमदार

लेकिन देश के अंदर चारू मजूमदार की इन कार्यवाही ने सीपीएम नेतृत्व को बुरी तरह नाराज कर दिया। पार्टी की बैठकों में उन्हें मानसिक तौर पर बीमार बताया गयाा। और यहां तक कहा गया कि वह एक पुलिस एजेंट है। कुछ नहीं यह कहा कि वह नई दिल्ली के इशारे पर काम कर रहे हैं ताकि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार को अस्थिर किया जा सके। कुछ ने उन्हें अमेरिकी एजेंट कहा लेकिन इन आलोचनाओं से तनिक भी विचलित हुए बिना कम्युनिस्टों का यह नक्सलबाड़ी ग्रुप माओ द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप अपना काम करता रहाा। 
कानु सान्याल

1968 के मध्य में कानू सान्याल,जंगल संथाल तथा एक अन्य कामरेड सुरेंद्र बोस अपने दो अन्य साथियों के साथ चीन की यात्रा पर गए ताकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से सैनीक और राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
  1969 में लेनिन के जन्म दिवस के अवसर पर चारू मजूमदार ने एक नई कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का एलान किया भाकपा( मार्क्सवादी-लेनीनवादी) या सीपीआई (एमएल)।
इसी बीच इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सेना भेजने का फैसला किया ताकि समस्या का सैन्य समाधान ढूंढा जाए। सेना,अर्धसैनिक बलों और पश्चिम बंगाल बिहार तथा उड़ीसा राज्य के पुलिस बलों की मदद से संयुक्त रूप से एक अभियान छेड़ा गया जिसे ऑपरेशन स्टिपल चेज नाम दिया गया।
अगले 72 दिनों के भीतर नक्सलबाड़ी विद्रोह पर काबू पा लिया गया था ।अधिकांश छापामार नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन चारू मजूमदार गिरफ्तारी से बचे रहे।
चारू मजूमदार ने महसूस किया कि नक्सलबाड़ी में आंदोलन विफल हो गया ।अब उन्होंने एक नए इलाके की तलाश शुरू की जहां से क्रांति को आगे बढ़ाया जा सके और सत्ता संघर्ष जारी रह सके। इस मकसद के लिए नक्सलबाड़ी के क्रांतिकारियों ने मिदानपुर का इलाका चुना उन दिनों मिदानपुर भारत का सबसे बड़ा जिला था और यह औद्योगिक तथा रेलवे के प्रमुख केंद्र खड़गपुर के बगल में स्थित था। अंग्रेजों के जमाने में भी यह क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जाना जाता था। युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस भी 1889 में वही पैदा हुए थे।जिन्हें एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट की हत्या के असफल प्रयास के जुर्म में 19 वर्ष की आयु में फांसी पर लटका दिया गया था। मृत्युदंड पाने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों मे उन्हें शुमार किया जाता है।
माओवादी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में
लाल इतिहास की फसल-1

नक्सलबाड़ी आंदोलन भले ही विफल हो गया हो लेकिन इसने युवकों की एक समूची पीढ़ी को प्रेरणा दे और क्रांतिकारी राजनीति की शुरुआत की दरअसल  के दशक का उतरार्ध्द सारी दुनिया ने युवकों के आंदोलन वाला दौर था ।चीन में सांस्कृतिक क्रांति की तैयारी चल रही थी ।अमेरिका वियतनाम ने बुरी तरह गिरा हुआ था ।कोलकाता की सड़कों पर बेचैन और क्षुब्द्ध युवक पुलिस की गाड़ियों पर देसी बम फेंक रहे थे। समृद्ध परिवार के छात्र अपने प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़कर और एक शानदार कैरियर को तिलांजलि देकर बिहार तथा अन्य इलाकों के जंगलों की ओर रवाना हो रहे थे ताकि क्रांति में हिस्सा ले सकें। भारत में ऐसे युवकों के लिए नक्सलबाड़ी ने एक जगमगाती रोशनी का काम किया।

सामंतवाद सबसे बड़ा कारण है जिसमें नक्सलवाद के शुरू होने में भूमिका निभाई।
      नक्सल विचारक और कवि वरवरा राव ने अपनी जेल डायरी में एक बड़े सामंत विश्नुुरु रूप देशमुख के खेतों में काम करने वाली मजदूर महिलाओं की पीड़ा का जबरदस्त वर्णन किया है।एक बार की घटना है जब उन महिलाओं ने उस से विनती की की अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए वह उन्हें थोड़ी देर के लिए खेत से बाहर जाने दे।बताया जाता है कि उसने मिट्टी का एक घड़ा मंगवाया और उन औरतों से कहा कि वे उस घड़े में अपने स्तन से दूध निकालकर भरे।इसके बाद उसने उन औरतों के हाथ से घड़ा छीन लिया और दूध अपने खेत में बिखेर दिया।
माओवादी प्रशिक्षण शिविर

1948 के मध्य तक तेलंगाना क्षेत्र का लगभग 1/6 हिस्सा कम्युनिस्ट छापामारो के नियंत्रण में आ गया था 1948 में भारतीय राज्य ने अपनी सेना को निजाम से निबटने और उसे सत्ता से हटाने के लिए भेजा।हैदराबाद को भारतीय संघ का एक हिस्सा बना लिया गया। इस संकुचित हो गए मुक्त क्षेत्र का अब और ज्यादा विस्तार नहीं किया जा सकता था। लिहाजा छापामारो को गोदावरी नदी, करीमनगर तथा नालगोंडा के जंगलों में जाकर शरण लेनी पड़ी। गोदावरी के वन क्षेत्र में भूमिहीन लोग मुख्य रूप से कोया आदिवासी समुदाय से हैं ।और इन्होंने छापामार संगठनो को अपना लिया जिसका आगे चलकर उन्हें उस समय जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा। जब कम्युनिस्टों के खिलाफ हेराल्ड ब्रिग्स की योजना की तर्ज पर सेना ने अभियान चलाया। हेराल्ड   ब्रिग्स 1950 के दशक में तत्कालीन मलय में कम्युनिस्टों के खिलाफ अभियान चलाने वाले ब्रिटिश डायरेक्टर थेे।
सीपीआई मे 1964 में उस समय औपचारिक तौर पर विभाजन हुआ।जब सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने के पक्षधर लोगों ने सीपीआई (एम)नाम से एक अलग पार्टी का गठन कर लिया। चारू मजूमदार जैसे लोग इस में शामिल हुए। जो बाद में इसकी नीतियों से असंतुष्ट हो गए जैसा कि पहले बताया गया है।
श्रीकाकुलम में भी उसी वर्ष गड़बड़ी पैदा हुई जिस वर्ष नक्सलबाड़ी की घटना हुई थी।
माओवादी

1950 के दशक में कुछ कम्युनिस्ट अध्यापकों ने सावरा और जटापु आदिवासियों के बीच काम शुरू किया। इनमें प्रमुख थे वेपंटापू सत्यनारायण जो एक करिश्माई नेता थेे। आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए उन्होंने दो शादियां की एक सावरा में और दूसरी जटापू समुदाय में। वेपंटापू सत्यनारायण के साथ थे   आदिबटला कैलासम इन्हें( सत्यम-कैलासम) नाम से ही लोगों के बीच बुलाया जाता था और इन दोनों ने मिलकर गिरिजन संगम की स्थापना की थी।
31 अक्टुबर 1967 को गिरीजनों का एक ग्रुप सत्य- कैलासम द्वारा बुलाए गए एक सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। जिसमें पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही आदिवासियों की गिरफ्तारी को देखते हुए भावी रणनीति पर विचार-विमर्श होना था। रास्ते में लिविडी गांव में इनकी जमीदारों से मुठभेड़ हुई जिसमें गोली लगने से दो गिरिजन कोरन्ना और मनगन्ना मारे गए।
तब आदिवासियों के छोटे-छोटे बच्चों ने तीर धनुष, भालो तथा अन्य पारंपरिक हथियारों से लैस होकर सूदखोरों और जमीदारों पर हमला बोल दियाा। उनकी जमीनों पर जबरन कब्जा किया और उन पर खुद फसल बोने लगे। पुलिस ने आने पर जमीदारों की तरफदारी की जिससे आदिवासी समुदाय और भी अलग-थलग पड़ गया।
लेकिन दो आदिवासियों की हत्या और पुलिस द्वारा जमींदारों की तरफदारी तथा बाद में आरोपियों का रिहा  हो जाना-इन घटनाओं ने सारा दृश्य ही बदल दिया। लगभग उसी समय चारू मजूमदार ने भी श्रीकाकुलम की गुप्त यात्रा की इससे पहले उनकी सलाह पाने के लिए यहां से दो व्यक्तियो को उनके पास भेजा गयाा थाा। मार्च
1969 में चारु मजूमदार की श्रीकाकुलम यात्रा ने यहां के आंदोलन को नई जिंदगी दी ।उन्होंने क्रांतिकारियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे श्रीकाकुलम को भारत का ऐनान बनाएंं। उन्होंने कहा कि वह 'वर्ग दुश्मन के सफाई' की नीति को पूरी  ताकत से लागू करेंं।
     चारू मजूमदार के दौरे के बाद श्रीकाकुलम की क्रांति और भी ज्यादा रक्तरंजित हो गई। नक्सलबाड़ी में जो नहीं हो सका था वह श्रीकाकुलम में हो गया यहां विद्रोही छापामारो को लाल इलाका(‍ रेड कॉरिडोर) यानी मुक्त क्षेत्र बनाने में कामयाबी मिली सत्यम और कैलासम के नेतृत्व में गिरीजनों ने अपने सैनिक दस्ते बनाये और वर्ग दुश्मनो के सफाई की अनेक कार्यवाइया की ।आंध्र प्रदेश में इन विश्वविद्यालयों मे डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की शिक्षा लेने वाले अनेक मेधावी छात्र आंदोलन में शामिल हो गए। लेकिन जब पुलिस ने अंततः लाल विद्रोहियों केेे खिलाफ जबरदस्त हमलावर कार्यवाही शुरू की तो उसमें कोई भेदभााव नहीं मिला । जिन विद्रोहियोंं को उसने पकड़ा उनमें से अधिकांश की बर्बरताा पूर्वक हत्या कर दी गई ।
एक युवा क्रांतिकारी पंचादी कृष्णमूर्ति को जिसकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी कुछ अन्य विद्रोहियों के साथ पुलिस ने 27 मई 1969 को पकड़ा और उन्हें जंगल में ले जाकर गोली मार दी ।यह सिलसिला आज भी जारी है।
         नक्सलबाड़ी आंदोलन ने जहां यह दिखाया कि किसानों को हथियार बंद करके क्या कुछ नहीं हासिल किया जा सकता है। वहीं श्रीकाकुलम की घटनाओं में छापामार युद्ध के जरिए बहुत कुछ हासिल करने का रास्ता प्रशस्त किया।
इसके 2 साल बाद ही चारू मजूमदार उस समय गिरफ्तार कर लिए गए ।जब उनके किसी सहयोगी ने गिरफ्तार होने के बाद पुलिस यंत्रणा न झेल पाने के कारण उनके गुप्त ठिकाने की जानकारी दे दी। मजूमदार पिछले कुछ समय से पुलिस से बच रहे थे ।लेकिन अब उन्हें कोलकाता के एंटाली इलाके के एक घर से गिरफ्तार कर लिया गयाा। गिरफ्तारी तारीख के 12 दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई ।कठोर भूमिगत जीवन में अनेक तरह की बीमारियों ने घेर रखा था । जेल में उन्हें उचित चिकित्साा नहीं दी गई और 28 जुलाई 1972 को उनका निधन हो गया ।इसके साथ ही कम्युनिस्ट विद्रोह का एक महत्वपूर्ण अध्यााय समाप्त  हो गया ।
लेकिन आंध्र प्रदेश में कुछ विद्रोहियों ने जिन्होंने छापामार युद्ध की क्षमता का अनुभव किया था इस चिंगारी को जिंदा रखा ।
लाल इतिहास की फसल-1

     आज भारत के हृदय स्थल में इसी चिंगारी ने एक                           ज्वाला का रूप ले लिया है।
                                                         -सलाम बस्तर




1857 की क्रांति का इतिहास

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