Saturday, 19 June 2021

वसंत के वज्रनाद की वापसी

क्रांति को संपन्न करना किसी भी व्यक्ति की ताकत से परे है।इसे किसी निर्धारित तारीख पर भी नहीं संपन्न किया जा सकता।इसे विशेष सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ही संपन्न किया जा सकता है।एक संगठित पार्टी का काम यह है कि वह ऐसी परिस्थितियों द्वारा प्रस्तुत किसी भी अवसर का इस्तेमाल करें।
                                                  -भगत सिहं



आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में एक स्कूल टीचर नें श्रीकाकुलम आंदोलन के दौरान हुए नुकसान का आकलन किया। 
कोंडापल्ली सीतारमैया-इन्होंने तेलंगाना आंदोलन में हिस्सा लिया था लेकिन सी पी आई के विभाजन के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी।इसके बाद जब चारू मजूमदार ने  सीी पी आई (एमएल) का गठन किया, तो 
सीता रमैया भी इसमें अपने एक अन्य सहयोगी के जी सत्यमूर्ति के साथ शामिल हुए।जिनकी कविता के क्षेत्र में काफी ख्याति थी।


        1969 में ही जिस समय देश के अनेक हिस्सों में विद्रोह की लपटें फैल रही थी,सितारामैया ने ककाती मेडिकल कॉलेज से चैनुस राम रेड्डी के रूप में एक व्यक्ति के दस्ते को वारंगल के मुल्लुगू के जंगलों में भेजा।
तेलंगाना के अनुभवों से सीतारमैया ने यह सबक हासिल किया था की जब तक एक सुरक्षित आधार ना तैयार कर लिया जाए जहां छापामारो को प्रशिक्षण दिया जा सके। और जो विद्रोहियों के लिए आश्रय स्थल का काम करें। तब तक लड़ाई करना संभव नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखकर चैनुस राम रेड्डी को मुल्लुगू के जंगलों में भेेेजा गया था।रेड्डी से कहा गया था कि वह इलाके केे लोगों के साथ रहे और उन्हें धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाए।लेकिन किसी समर्थन प्रणाली के अभाव में वह लंबे समय तक वहां ठीक नहीं सका और कुछ हासिल किए बिना उसेे लौटना पड़़ा ।
        सीतारमैया यह बात समझ में आ गई कि उसे क्यों वापस आना पड़ा।उन्होंने अब "खुले" जन संगठनों के महत्व को समझना शुरू किया लेकिन यह एक ऐसी बात थी जिसका चारू मजूमदार जबरदस्त विरोध करते थे ।1970 में आयोजित सीपीआई(एम एल)की कांग्रेस में चारू मजूमदार ने स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी का कोई भी खुला स्वरूप नहीं होगा। लेेेकिन अब सीतारमैया केे सामने यह बात साफ हो गई थी कि इस तरह का संगठन होना जरूरी है ।वरवरा राव का कहना है कि 'सीतारमैैैया के खूबियों में एक खूबी यह थी की पहले वह आपकी बात पूरी तन्मयताा से सुनते थे और उसके बाद जवाबी टिप्पणी देते हुए आपको अपनी बात सेेे सहमत कराते थे'। चारु मजूमदार की लाइन का पहला उल्लंघन तब हुआ जब आंध्र प्रदेश में क्रांतिकारी लेखक संगठन (रिवॉल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन) की स्थापना हुई। इसके बाद 1972 में जन नाट्य मंडली का गठन किया गया। पिल्लापु नामक पत्रिका में चारू मजूमदार ने सीतारमैया के नाम एक संदेश भेेेेेजा। जिसमेंं कहा गया थाा कि 'आप लेखक संघ की शुरुआत कर रहे हैं इस पत्रिका के जरिए मैं आपको एक संदेश भेज रहा हूं:। यह बलिदान देने का समय है।'


         इस संदेश का यह स्पष्ट अर्थ था कि मजूमदार ने मोर्चा संगठनों के गठन की सीतारमैया की नीति को स्वीकार कर लिया था।लगभग इन्हीं दिनों हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय और वारंगल के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज के अनेक छात्र क्रांतिकारी नीति की ओर आकर्षित हुए ।1974-75 में उस्मानिया विश्वविद्यालय के 14 छात्रों ने संकल्प किया कि वे अपना परिवार नहीं बसायेंगे और अपना पूरा जीवन जनता की क्रांति के लिए समर्पित कर देंगे।इस अवधि में गुंटुर,तिरुपति और विशाखापट्टनम जैसे स्थानों से 40 अन्य लोग भूमिगत हो गए। इसी के आसपास सीतारमैैैया ने यह भी निश्चय किया कि अन्य 'खुलें' संगठनों का निर्माण किया जााए। 12 अक्टूबर 1974 को रेडिकल स्टूडेंट यूनियन(आर एस यू) की स्थापना हुई और इसका पहलाा राज्य सम्मेलन फरवरी 1975 में हैदराबाद में आयोजित किया गया।जिसमेंं रणनीति तैयार की गयीी की किस तरह छात्रों के आंदोलनों का संबंध क्रांति के विचार से जोड़ा जाए इस सम्मेलन में हजारोंं की संख्या में छात्रों नेे हिस्सा लिया ।हिस्सा लेने वाले छात्रों में सबसे बड़ा समूह तेलंगाना काा था। 
उन दिनों इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी उनकी राजनीतिक घपलेबाजी की वजह से 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी गई। आर एस यू जैसेेे 'खुले' संगठनों को दमनकारी तंत्र का शिकार होनाा पड़ा। सैकड़ोंं की तादाद में छात्रों को गिरफ्ताार किया गयाा। उन्हेंं यंत्रणा दी गई और फिर जेलों में डाल दिया गया।
चार युवा छात्रों जनार्दन,मुरली,आनंद और  को जंगल में ले जाकर पुलिस द्वारा गोलियों से उड़ाा दिया दिया गया।इन सबके बावजूद आंध्र प्रदेश केे सभी कालेजों और विश्वविद्यालयोंं मे आर एस यू की गतिविधियां जारी रही।


     इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1978 में एक अन्य संगठन रेडिकल यूथ लीग की स्थापना हुई।जन नाट्य मंडली और आर एस यू के साथ साथ आर वाई एल के सदस्यों ने भी एक आंदोलन की शुरुआत की ।जिसे गांव चलो अभियान कहा गया सीतारमैया ने इस तरीके का इजाद यह सोचकर किया था कि इससे विद्रोही छात्रों को किसानों के साथ घुलने मिलने का अवसर मिलेगा।पार्टी के एजेंडे को किसानों के बीच ले जाने का यह अत्यंत कारगर तरीका था। 

गांव में चलाए जा रहे इस अभियान के दौरान छात्र नेता ग्रामीण लोगों को राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाते और ग्रामीण समाज में जमीन आधारित संबंधों के बारे में जानकारियां जूटाते थे। वे यह भी पता करते कि उन ग्रामीणों के बीच ऐसे कौन लोग हैं जिनके अंदर कुशल कार्यकर्ता बनने की संभावना है। इसके बाद इन नामों को केंद्रीय संगठन कर्ता को दे दिया जाता है। केंद्रीय संगठन कर्ता पर उक्त इलाके की जिम्मेदारी होती थी और वह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता था। छापामार ढांचे में उन दिनों एक दस्ते में सीओ और उसके दो अंगरक्षक होते थे और यह सभी पूरी तरह हथियारों से लैस रहते थे।
यह एक सच्चाई है कि माओवाद प्रभावित अनेक इलाकों में सुरक्षाबलों का मनोबल गिरा हुआ है।लेकिन फिर भी समूचे, लाल क्षेत्र में माओवादियों के खिलाफ कार्यवाही चल रही हैै। राज्य की शक्तियां जहां संभव होता है माओवादियों पर प्रहार करती हैं और माओवादियों को जहां मौका मिलता है पलट कर प्रहार करते हैं।

                 एक खूनी लड़ाई जारी है

Wednesday, 16 June 2021

राजमाता जीजाबाई

           
जीजाबाई (1594-1674) महान मराठा शासक और योद्धा शिवाजी की माता जी थी।शिवाजी मुगल साम्राज्य के खिलाफ मजबूती से लड़े और हिंदवी स्वराज की स्थापना की। जीजा बाई का जन्म 1594 ई० में महाराष्ट्र के गांव सिंधखेड़ में हुआ था उनके पिता शाही दरबारी और प्रमुख मराठा सरदार थे जिनका नाम लखुजी जाधवराव था, जबकि उनकी माता का नाम म्हालसा बाई था। उनके पिता अहमदनगर में निजामशाही की सेवा करते थे और उन्हें अपने ऊंचे रुतबे और पद पर गर्व थाा। जीजाबाई की शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी।

उस कालखंड के रीति रिवाज के मुताबिक उनका विवाह शाहजी भोंसले से हुआ। शाहजी निजाम शाह के दरबार में राजनयीक पद संभालते थेे। वह एक बेहतरीन योद्धा भी थेे।
शाहजी भोंसले के पिताजी का नाम मालोजी शिलेदार था जो बाद में तरक्की पाते हुए सरदार मालोजी राव भोसले बन गए वैसे तो दंपत्ति का वैवाहिक जीवन बेहद सुखद था लेकिन उनके परिजनों की आपस में टकराहट ने तनाव को जन्म दिया। शाहजी राजे और उनके ससुर जाधव के आपसी रिश्ते बिगड़ गये।


हालात इतने बिगड़ चुके थे जीजाबाई पूरी तरह टूट गई थी। उन्हें अपने पति और पिता मे से एक का पक्ष लेना था उन्होंने पति का साथ दिया।
जीजाबाई अपने पति के साथ शिवनेरी के किले में ही रही।उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई हालांकि,उन्हें इस बात का दुख था कि उनके पिता और पति दोनों किसी और शासक के अधीन काम करते हैं। उनकी इच्छा थी कि मराठों का अपना साम्राज्य स्थापित हो। दोनों की 8 संताने हुयी 2 लड़के और 6 बेटियां शिवाजी उनके दो बेटों में से एक थे। वह हमेशा भगवान से प्रार्थना करती थी कि उन्हें एक ऐसा बेटा मिले जो मराठा साम्राज्य की नींव रख सके। उनकी प्रार्थनाओं का जवाब शिवाजी के तौर पर मिला जिन्होंने मराठा साम्राज्य की स्थापना की।
जीजाबाई को एक प्रभावी और प्रतिबद्ध महिला के तौर पर जाना जाता है। जिसके लिए आत्म सम्मान और उनके मूल्य सर्वोपरि हैं। अपनी दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध जीजाबाई खुद एक योद्धा और प्रशासक थी। उन्होंने बढ़ते शिवाजी में अपने गुणों का संचार किया।शिवाजी में कर्तव्य भावना,साहस और मुश्किल परिस्थितियों का सामना साहस के साथ करने के लिए मूल्यों का संचार किया।उनकी  देख-रेख और मार्गदर्शन में शिवाजी ने मानवीय रिश्तो की अहमियत समझी महिलाओं का मान सम्मान,धार्मिक सहिष्णुता और न्याय के साथ ही अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और महाराष्ट्र की आजादी की इच्छा बलवती हुई।


शिवाजी भी अपने सभी सफलताओं का श्रेय अपनी मां को देते थे,जो उनके लिए प्रेरणास्रोत थीं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे को मराठा साम्राज्य का महानतम शासक बनाने पर लगा दी।
वह शिवाजी और उनके साथियों की सफलता देखकर गर्वित होती थी। जीजा बाई का सपना उस समय पूरा हुआ। जब उनकी आंखों के सामने उनके बेटे का राज्य अभिषेक समारोह संपन्न हुआ। 1674 में शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ और वह मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले महाप्रतापी राजा बने।


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भारत में अशोक राज

अशोक-राज वस्तुतः भारत का स्वर्ण काल था। इसी काल में प्राचीन भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित हुआ। एक भाषा और लिपि से जबरदस्त राष्ट्रीय एकता कायम हुई। इसी काल में धम्म की धमक  पश्चिमी एशिया,उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व यूरोप से लेकर दक्षिण के राज्यों तक सरसरा कर पहुंच गई थी। राज्य भी अहिंसक हो सकता है ।इसकी मिसाल विश्व इतिहास में अशोक-राज ने साबित कर दिया।
    बुद्ध और अशोक भारत की शांति-संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। अशोक-राज में दोनों प्रतीकों का ऐसा मणिकांचन संयोग हुआ कि भारत का गौरव बाइस सौ साल बाद भी धूमिल नहीं हो सका।

     अशोक और उनका परिवार


विश्व इतिहास में सिकंदर,सीजर,नेपोलियन जैसे विजेता हुए मगर किसी को इतिहास में वह स्थान प्राप्त नहीं है ।जो सम्राााट अशोक को प्राप्त है एक ऐसा सम्राट जिन्होंने तलवार का त्याग विजित होने पर नहीं बल्कि विजेता होने पर किया।एच जी वेल्स ने लिखा कि इतिहास में वर्णित हजारों राजाओं और महाराजाओं के बीच देवानंपीय अशोक का नाम एक चमकदार नक्षत्र केे अनुरूप अकेला चमक रहा है। वोल्गा से लेकर जापान तक आज भी उनका नाम  आदर के साथ लिया जाता है। चीन, तिब्बत तथा भारत भी उनके बड़प्पन का बखान करते हैं। प्रणय आलिंगन
अशोक के जमाने में वर्ण-व्यवस्था नहीं थी तब गण-व्यवस्था थी मगर इतिहासकार अशोक को कभी छत्रिय तो कभी शुद्र बताए जाने की खोज में लगे रहते हैं। और निरर्थक इतिहास के पन्ने खर्च करते हैं।जो वर्ण व्यवस्था सम्राट अशोक के समय में नहीं थी उसे खोजने की कोशिश जातिवादी मानसिकता का द्योतक है तब गण व्यवस्था थी और अशोक मौरीय गण से आते थे।मगर इतिहासकार पुराणों को आधार बनाकर उन्हें शुद्र बनाने पर तुले हुए हैं।
सम्राट अशोक की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। कि उनके जीवन की दास्तान संस्कृत,पाली,तिब्बती,चीनी,बर्मी,सिंहल,थाई,लाओ और खेतानी जैसे अनेक भाषा ग्रंथ अपने-अपने ढंग से सुनाते हैं। कोई उनकी मां का नाम सुभद्गरागीं तो कोई धम्मा बताता हैै। उसी प्रकार अशोक की पत्नी का नाम अलग-अलग ग्रथों में अलग-अलग मिलताा है। मगर अशोक की रानी के अभिलेख मेंं उनकी उनकी पत्नी का नाम कालूवाकी मिलता हैै जो तिवल की मां थी। हमारेे यहां तिष्यरक्षिता को लेकर अनेक साहित्य रचे गए ।लेकिन कालूवाकी को लेकर साहित्य में कोई हलचल नहींं है।जबकी कालूवाकी का ही पुरातात्विक सबूत हमारे पास है चूूूँँकि कालूवाकी नाम आर्यमुलक नहींं हैै। इसकी सजा कालूवाकी को साहित्य बाहर कर दी गई।
अशोक के अभिलेखों से अशोक के परिवार के कुछ है सदस्यों का पता चलता है श्रीलंका के एक मामूली स्तूप के एक मामूली पत्थर पर जो अम्पारा जिले के राजगला में स्थित है । इसका प्रमाण मिला है कि महिंद्र थेर श्री लंका गए थे धम्म लिपि और सिंहली भाषा ने लिखा है कि यह स्तूप ईदीका थेर और महींद्र थेर का है, जो इस भूमि के उज्जवल भविष्य के लिए यहां आए थे।
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में पानगुरारिया बौद्ध विहार है पानगुरारिया में दो शिलालेख और एक यष्टी लेख पर अशोक की बेटी संघमित्रा द्वारा दान दिए जाने का विवरण अंकित है।जिससे संघमित्रा के पुरातात्विक ऐतिहासिकता पुष्ट होती है।
सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी। नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तीय से ब्याही गई थी।पति-पत्नी दोनों बुधमार्गी थे ।काठमांडू से सटे चाबहील में चारुवति का स्तूूप है।
अशोक का पहली बार रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मौर्य मिलता है। जूनागढ़ अभिलेख दूसरी सदी का है।जूनागढ़ अभिलेख में लिखा है कि सुदर्शन तालाब मौर्य नरेश चंद्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने बनवाया था अशोक मौर्य के लिए यवनराज तुषास्प ने उसे बड़ी बड़ी नालियों से युक्त किया ।पुराणों में अशोक का नाम अशोक वर्धन मिलता है जो बाद में लिखे गए हैं।अशोक के खुद के शिलालेखों(मास्की गुर्जरा नेत्तूर और उड़ेगोलम)ने उनका नाम अशोक लिखा मिलता है।

राजगद्दी पर बैठने के बाद अशोक ने सिर्फ एक युद्ध किए जो कलिंग युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार है ।अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने आज से कोई ढाई हजार साल पहले पश्चिमोत्तर भारत की उस वैज्ञानिक सीमाओं को प्राप्त कर लिए थे जिस को छूने के लिए आधुनिक काल में अंग्रेज व्यर्थ की आहें भरते रहे। बिंदुसार न्यू इस महान साम्राज्य को बचाए रखा अशोक ने उसे और विस्तार दिया अशोक ने 14 में शिलालेख में स्वयं कहाा है कि मेरा साम्राज्य विस्तृत है अशोक के साम्राज्य की सीमाएं कहां से कहां तक विस्तृत थी इसका पता हमें विभिन्न स्थानों से प्राप्त उनके ही अभिलेखों से पता चलता है दूसरे किसी सबूत की जरूरत नही है ।अशोक का साम्राज्य उत्ततर पश्चिम में हिंदूकुश से पूरब में बंगाल तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में मैसूर तक विस्तृत था कलिंग और सौराष्ट्र पर भी उनका अधििकार था।प्राचीन भारत का कोई सम्राट इतने विस्तृत भूखंड का स्वामी नहीं था।
जिस दार्शनिक और दर्शन की खोज में सम्राट अशोक के पिता यूनान तक अपनी आंखें गड़ाए हुए थे। अशोक की आंखों ने वह दार्शनिक और दर्शन यही भारत में ही खोज निकाले ।उन्होंने गंगा घाटी के धम्म को उठाकर विश्वधम्म का रूप दे डाले। लेनिन ने राजनीति में मार्क्स के सिद्धांतों को लागू किए और अशोक ने राजनीति में बुद्ध के सिद्धांतों को लागू किये और इस सिद्धांत पर चलकर वे दुनिया में वह मुकाम हासिल किए जो कम ही सम्राटों को नसीब हुए सच में अशोक दी ग्रेट साम्राज्य विस्तार के सैनिक-सम्राट थे तो युद्ध की विभीषिका के से आहत संवेदनशील और दुखी मनुष्य भी थेे।
रमेश चंद्र मजूमदार ने लिखा है कि साम्राज्य तो उठते गिरते रहे हैं लेकिन अशोक के माध्यम से भारत के नैतिक विजय को जो गौरव प्राप्त हुआ है उसकी दीप्ति 2000 साल से अधिक समय बीत जाने पर भी धुंधली नहीं हुई है।

Tuesday, 15 June 2021

पं० रामनाथ पाठक

प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पूर्वविधायक स्वपं० रामनाथ पाठक की 26वीं पुण्य तिथि पर कोटिश: नमन।।
अविभाजित जनपद मीरजापुर के ग्राम पसही कलां के मूल निवासी भारत माता के अमर सपूत पूज्य पंडित रामनाथ पाठक जी का जन्म वर्ष 1912 की श्रावण शुक्ला सप्तमी को लसडा गावँ में हुआ था। अल्पायु मे ही इनके पिता की मृत्यु होने से घर- गृहस्थी के दायित्व के साथ-साथ आप देश मे चल रहे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े तथा वाराणसी मंडल मे क्रांतिकारी विचार वाले  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अनुयायियों के साथ आन्दोलन को  गतिमान बनाने में लग गए।
             वर्ष 1936 मे आपने काग्रेस पार्टी की सक्रिय सदस्यता ग्रहण की। स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन मे वर्ष 1941-42 मे आप जेल गए जहाँ इन्हें नजरबंद कर तनहाई मे रखा गया व कठोर यातनाए दी गई।    देश की स्वतंत्रता के पश्चात वर्ष 1962 मे रावर्टसगंज व वर्ष 1967 मे राजगढ विधान सभा से आप दो बार अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से  विधायक रहे तथा जनपद मीरजापुर एवं सोनभद्र मे लोक कल्याण के लिए अविस्मरणीय सेवा की।तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत से प्रयास कर आपने जिले को बुन्देलखण्ड के समान सुविधाओं का लाभ   दिलाया।वर्ष 1952 मे भुखमरी के कारण  हुई मौतों के आधार पर मीरजापुर जिले को अकालग्रस्त घोषित कराना, वर्ष  1954 मे राजकीय सीमेंट फैक्ट्री चुर्क का उदघाटन प्रधानमंत्री  नेहरूजी ने किया था जिस समारोह की अध्यक्षता आपने की थी।
नेहरूजी से आग्रह कर आपने सीमेंट कारखाने मे नौकरी हेतु स्थानीय लोगों को विशेष प्राथमिकता दिलवाई थी जिससे सैकड़ों जनपदवासियो को रोजी-रोटी मिली।जन कल्याण हेतु आपके प्रयास से जसौली मे सिंचाई हेतु नगवा बाॅध से नहरों का निर्माण, दुद्धी तहसील मे लोहा,कोयला व सीमेंट  विक्री हेतु स्थानीय स्तर पर सरकारी दुकानों का आवंटन,रावर्टसगंज को अलग जिला बनाने हेतु विधान सभा मे पहल,प्राथमिक विद्यालयों मे तदर्थ नियुक्ति हेतु मात्र कक्षा 5 उत्तीर्ण स्थानीय लोगों कोअध्यापक बनवाने हेतु तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त द्वारा विशेष  शासनादेश दिलाकर सैकड़ो अध्यापको की नियुक्ति,  वर्ष 1963 मे रिहन्द जल विद्युत परियोजना के शुरू कराने का कार्य,वर्ष 1967 मे प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी जी के साथ भयंकर अकालग्रस्त सम्पूर्ण जिले के दौरे मे उनके  साथ रहकर स्थलीय निरीक्षण करवाया ।जिससे  अनेकों तालाब व सड़कों के निर्माण राहत कार्य द्वारा हुए। 1972 मे हुए मध्यावधि चुनाव में मुख्यमन्त्री कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी  को राजगढ विधान सभा से पहली बार विजयी बनाने मे महती भूमिका निभाई।स्वतंत्रता दिवस  की रजत जयंती पर स्वतंत्रता संग्राम मे देश की स्मरणीय सेवा हेतु 15 अगस्त 1972 को प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने ताम्र पत्र प्रदान कर आपको सम्मानित किया  तथा राज्य व केंद्र  सरकार से आजीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन से मानवर्धन किया ।
 पाठक जी का भरा-पूरा परिवार उनके पुण्य प्रताप से है।आपकी दो पुत्रियां अपने सफल गृहस्थ जीवन का संपूर्ण निर्वहन कर दुर्भाग्यवश अब परलोकवासिनी हुईं व आपके एकमात्र पुत्र डाक्टर श्री मार्कण्डेय राम पाठक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 37 वर्षों की सक्रिय सेवा मे संयुक्त कुल सचिव व वित्त अधिकारी पद से 2017 मे सेवानिवृत्ति के पश्चात ।
अब संयुक्त कुल सचिव विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षाओं के पद पर पुनर्नियोजित है एवं अपने प्रशासनिक गुरूतर दायित्वों का कर्तव्यनिष्ठ सेवाभाव से संपादन कर रहे हैं। पाठक जी की तीनों पौत्रियां शादीशुदा होकर सुखपूर्वक अपनी गृहस्थी में रमी हैं व पाठक के जी के दो पौत्रों में से बड़े पौत्र कौशलेश पाठक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बीए,एल एल बी कर सम्प्रति जिलाध्यक्ष कांग्रेस सेवादल हैं व अपने पूज्य पितामह के पदचिन्हों पर चल रहे हैं। छोटे पौत्र शैलेश पाठक बीएससी (कृषि),एमबीए(एग्रीबिजनेस -गोल्ड मेडल ) सम्प्रति देश की प्रतिष्ठापरक डेयरी -आनन्दा मे उप महाप्रबंधक  पद पर सेवारत हैं। 
ऐसे पुण्यात्मा,देश सेवाव्रत को जीवन पर्यंत मनसा-वाचा-कर्मणा अपनी दिनचर्या में समाहित करने वाले, भारतमाता के अमर सपूत पूज्य पंडित रामनाथ पाठक जी ने जीवन की अंतिम सांस वाराणसी मे 15 जून 1995 को ली एवं उन्हें शिव-सायुज्य मोक्ष मिला।
कीर्तिरयस्य स जीवति। परम पूज्यनीय पाठक जी को 
हमारी  विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

Monday, 14 June 2021

लाल इतिहास की फसल -2

बिहार के जंगलों में 2007 में माओवादियों के कांग्रेस में शामिल हुए विद्रोहियों की तस्वीर

नक्सलबाड़ी की इन घटनाओं पर चीन ने फौरन अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के मुखपत्र पीपुल्स डेली ने अपने संपादकीय में नक्सलबाड़ी की घटनाओं को वसंत का वज्रनाद कहा।
पीपुल्स डेली ने लिखा दार्जिलिंग क्षेत्र के क्रांतिकारी किसानों ने विद्रोह कर दिया है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक क्रांतिकारी समूह के नेतृत्व में ग्रामीण क्रांतिकारी ससस्त्र संघर्ष के एक लाल क्षेत्र की स्थापना भारत में हो गई है। भारतीय जनता के क्रांतिकारी संघर्ष के लिए यह घटना जबरदस्त महत्व रखतीी है।
चारु मजुमदार

लेकिन देश के अंदर चारू मजूमदार की इन कार्यवाही ने सीपीएम नेतृत्व को बुरी तरह नाराज कर दिया। पार्टी की बैठकों में उन्हें मानसिक तौर पर बीमार बताया गयाा। और यहां तक कहा गया कि वह एक पुलिस एजेंट है। कुछ नहीं यह कहा कि वह नई दिल्ली के इशारे पर काम कर रहे हैं ताकि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार को अस्थिर किया जा सके। कुछ ने उन्हें अमेरिकी एजेंट कहा लेकिन इन आलोचनाओं से तनिक भी विचलित हुए बिना कम्युनिस्टों का यह नक्सलबाड़ी ग्रुप माओ द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप अपना काम करता रहाा। 
कानु सान्याल

1968 के मध्य में कानू सान्याल,जंगल संथाल तथा एक अन्य कामरेड सुरेंद्र बोस अपने दो अन्य साथियों के साथ चीन की यात्रा पर गए ताकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से सैनीक और राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
  1969 में लेनिन के जन्म दिवस के अवसर पर चारू मजूमदार ने एक नई कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का एलान किया भाकपा( मार्क्सवादी-लेनीनवादी) या सीपीआई (एमएल)।
इसी बीच इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सेना भेजने का फैसला किया ताकि समस्या का सैन्य समाधान ढूंढा जाए। सेना,अर्धसैनिक बलों और पश्चिम बंगाल बिहार तथा उड़ीसा राज्य के पुलिस बलों की मदद से संयुक्त रूप से एक अभियान छेड़ा गया जिसे ऑपरेशन स्टिपल चेज नाम दिया गया।
अगले 72 दिनों के भीतर नक्सलबाड़ी विद्रोह पर काबू पा लिया गया था ।अधिकांश छापामार नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन चारू मजूमदार गिरफ्तारी से बचे रहे।
चारू मजूमदार ने महसूस किया कि नक्सलबाड़ी में आंदोलन विफल हो गया ।अब उन्होंने एक नए इलाके की तलाश शुरू की जहां से क्रांति को आगे बढ़ाया जा सके और सत्ता संघर्ष जारी रह सके। इस मकसद के लिए नक्सलबाड़ी के क्रांतिकारियों ने मिदानपुर का इलाका चुना उन दिनों मिदानपुर भारत का सबसे बड़ा जिला था और यह औद्योगिक तथा रेलवे के प्रमुख केंद्र खड़गपुर के बगल में स्थित था। अंग्रेजों के जमाने में भी यह क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जाना जाता था। युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस भी 1889 में वही पैदा हुए थे।जिन्हें एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट की हत्या के असफल प्रयास के जुर्म में 19 वर्ष की आयु में फांसी पर लटका दिया गया था। मृत्युदंड पाने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों मे उन्हें शुमार किया जाता है।
माओवादी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में
लाल इतिहास की फसल-1

नक्सलबाड़ी आंदोलन भले ही विफल हो गया हो लेकिन इसने युवकों की एक समूची पीढ़ी को प्रेरणा दे और क्रांतिकारी राजनीति की शुरुआत की दरअसल  के दशक का उतरार्ध्द सारी दुनिया ने युवकों के आंदोलन वाला दौर था ।चीन में सांस्कृतिक क्रांति की तैयारी चल रही थी ।अमेरिका वियतनाम ने बुरी तरह गिरा हुआ था ।कोलकाता की सड़कों पर बेचैन और क्षुब्द्ध युवक पुलिस की गाड़ियों पर देसी बम फेंक रहे थे। समृद्ध परिवार के छात्र अपने प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़कर और एक शानदार कैरियर को तिलांजलि देकर बिहार तथा अन्य इलाकों के जंगलों की ओर रवाना हो रहे थे ताकि क्रांति में हिस्सा ले सकें। भारत में ऐसे युवकों के लिए नक्सलबाड़ी ने एक जगमगाती रोशनी का काम किया।

सामंतवाद सबसे बड़ा कारण है जिसमें नक्सलवाद के शुरू होने में भूमिका निभाई।
      नक्सल विचारक और कवि वरवरा राव ने अपनी जेल डायरी में एक बड़े सामंत विश्नुुरु रूप देशमुख के खेतों में काम करने वाली मजदूर महिलाओं की पीड़ा का जबरदस्त वर्णन किया है।एक बार की घटना है जब उन महिलाओं ने उस से विनती की की अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए वह उन्हें थोड़ी देर के लिए खेत से बाहर जाने दे।बताया जाता है कि उसने मिट्टी का एक घड़ा मंगवाया और उन औरतों से कहा कि वे उस घड़े में अपने स्तन से दूध निकालकर भरे।इसके बाद उसने उन औरतों के हाथ से घड़ा छीन लिया और दूध अपने खेत में बिखेर दिया।
माओवादी प्रशिक्षण शिविर

1948 के मध्य तक तेलंगाना क्षेत्र का लगभग 1/6 हिस्सा कम्युनिस्ट छापामारो के नियंत्रण में आ गया था 1948 में भारतीय राज्य ने अपनी सेना को निजाम से निबटने और उसे सत्ता से हटाने के लिए भेजा।हैदराबाद को भारतीय संघ का एक हिस्सा बना लिया गया। इस संकुचित हो गए मुक्त क्षेत्र का अब और ज्यादा विस्तार नहीं किया जा सकता था। लिहाजा छापामारो को गोदावरी नदी, करीमनगर तथा नालगोंडा के जंगलों में जाकर शरण लेनी पड़ी। गोदावरी के वन क्षेत्र में भूमिहीन लोग मुख्य रूप से कोया आदिवासी समुदाय से हैं ।और इन्होंने छापामार संगठनो को अपना लिया जिसका आगे चलकर उन्हें उस समय जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा। जब कम्युनिस्टों के खिलाफ हेराल्ड ब्रिग्स की योजना की तर्ज पर सेना ने अभियान चलाया। हेराल्ड   ब्रिग्स 1950 के दशक में तत्कालीन मलय में कम्युनिस्टों के खिलाफ अभियान चलाने वाले ब्रिटिश डायरेक्टर थेे।
सीपीआई मे 1964 में उस समय औपचारिक तौर पर विभाजन हुआ।जब सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने के पक्षधर लोगों ने सीपीआई (एम)नाम से एक अलग पार्टी का गठन कर लिया। चारू मजूमदार जैसे लोग इस में शामिल हुए। जो बाद में इसकी नीतियों से असंतुष्ट हो गए जैसा कि पहले बताया गया है।
श्रीकाकुलम में भी उसी वर्ष गड़बड़ी पैदा हुई जिस वर्ष नक्सलबाड़ी की घटना हुई थी।
माओवादी

1950 के दशक में कुछ कम्युनिस्ट अध्यापकों ने सावरा और जटापु आदिवासियों के बीच काम शुरू किया। इनमें प्रमुख थे वेपंटापू सत्यनारायण जो एक करिश्माई नेता थेे। आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए उन्होंने दो शादियां की एक सावरा में और दूसरी जटापू समुदाय में। वेपंटापू सत्यनारायण के साथ थे   आदिबटला कैलासम इन्हें( सत्यम-कैलासम) नाम से ही लोगों के बीच बुलाया जाता था और इन दोनों ने मिलकर गिरिजन संगम की स्थापना की थी।
31 अक्टुबर 1967 को गिरीजनों का एक ग्रुप सत्य- कैलासम द्वारा बुलाए गए एक सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। जिसमें पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही आदिवासियों की गिरफ्तारी को देखते हुए भावी रणनीति पर विचार-विमर्श होना था। रास्ते में लिविडी गांव में इनकी जमीदारों से मुठभेड़ हुई जिसमें गोली लगने से दो गिरिजन कोरन्ना और मनगन्ना मारे गए।
तब आदिवासियों के छोटे-छोटे बच्चों ने तीर धनुष, भालो तथा अन्य पारंपरिक हथियारों से लैस होकर सूदखोरों और जमीदारों पर हमला बोल दियाा। उनकी जमीनों पर जबरन कब्जा किया और उन पर खुद फसल बोने लगे। पुलिस ने आने पर जमीदारों की तरफदारी की जिससे आदिवासी समुदाय और भी अलग-थलग पड़ गया।
लेकिन दो आदिवासियों की हत्या और पुलिस द्वारा जमींदारों की तरफदारी तथा बाद में आरोपियों का रिहा  हो जाना-इन घटनाओं ने सारा दृश्य ही बदल दिया। लगभग उसी समय चारू मजूमदार ने भी श्रीकाकुलम की गुप्त यात्रा की इससे पहले उनकी सलाह पाने के लिए यहां से दो व्यक्तियो को उनके पास भेजा गयाा थाा। मार्च
1969 में चारु मजूमदार की श्रीकाकुलम यात्रा ने यहां के आंदोलन को नई जिंदगी दी ।उन्होंने क्रांतिकारियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे श्रीकाकुलम को भारत का ऐनान बनाएंं। उन्होंने कहा कि वह 'वर्ग दुश्मन के सफाई' की नीति को पूरी  ताकत से लागू करेंं।
     चारू मजूमदार के दौरे के बाद श्रीकाकुलम की क्रांति और भी ज्यादा रक्तरंजित हो गई। नक्सलबाड़ी में जो नहीं हो सका था वह श्रीकाकुलम में हो गया यहां विद्रोही छापामारो को लाल इलाका(‍ रेड कॉरिडोर) यानी मुक्त क्षेत्र बनाने में कामयाबी मिली सत्यम और कैलासम के नेतृत्व में गिरीजनों ने अपने सैनिक दस्ते बनाये और वर्ग दुश्मनो के सफाई की अनेक कार्यवाइया की ।आंध्र प्रदेश में इन विश्वविद्यालयों मे डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की शिक्षा लेने वाले अनेक मेधावी छात्र आंदोलन में शामिल हो गए। लेकिन जब पुलिस ने अंततः लाल विद्रोहियों केेे खिलाफ जबरदस्त हमलावर कार्यवाही शुरू की तो उसमें कोई भेदभााव नहीं मिला । जिन विद्रोहियोंं को उसने पकड़ा उनमें से अधिकांश की बर्बरताा पूर्वक हत्या कर दी गई ।
एक युवा क्रांतिकारी पंचादी कृष्णमूर्ति को जिसकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी कुछ अन्य विद्रोहियों के साथ पुलिस ने 27 मई 1969 को पकड़ा और उन्हें जंगल में ले जाकर गोली मार दी ।यह सिलसिला आज भी जारी है।
         नक्सलबाड़ी आंदोलन ने जहां यह दिखाया कि किसानों को हथियार बंद करके क्या कुछ नहीं हासिल किया जा सकता है। वहीं श्रीकाकुलम की घटनाओं में छापामार युद्ध के जरिए बहुत कुछ हासिल करने का रास्ता प्रशस्त किया।
इसके 2 साल बाद ही चारू मजूमदार उस समय गिरफ्तार कर लिए गए ।जब उनके किसी सहयोगी ने गिरफ्तार होने के बाद पुलिस यंत्रणा न झेल पाने के कारण उनके गुप्त ठिकाने की जानकारी दे दी। मजूमदार पिछले कुछ समय से पुलिस से बच रहे थे ।लेकिन अब उन्हें कोलकाता के एंटाली इलाके के एक घर से गिरफ्तार कर लिया गयाा। गिरफ्तारी तारीख के 12 दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई ।कठोर भूमिगत जीवन में अनेक तरह की बीमारियों ने घेर रखा था । जेल में उन्हें उचित चिकित्साा नहीं दी गई और 28 जुलाई 1972 को उनका निधन हो गया ।इसके साथ ही कम्युनिस्ट विद्रोह का एक महत्वपूर्ण अध्यााय समाप्त  हो गया ।
लेकिन आंध्र प्रदेश में कुछ विद्रोहियों ने जिन्होंने छापामार युद्ध की क्षमता का अनुभव किया था इस चिंगारी को जिंदा रखा ।
लाल इतिहास की फसल-1

     आज भारत के हृदय स्थल में इसी चिंगारी ने एक                           ज्वाला का रूप ले लिया है।
                                                         -सलाम बस्तर




Sunday, 13 June 2021

लाल इतिहास की फसल-1

उन घटनाओं से जो आपके जन्म से पहले घटित हो चुकी 

हैं, उनसे अनभिज्ञ बने रहना एक शिशु बने रहना जैसा है 

                                                                     - सिसेरो

कभी-कभी इतिहास एक गृहणी की तरह काम करता है। वह वर्तमान के कानों में फुसफुसा कर बताता है कि अतीत की घटनाओं का असर किस तरह भविष्य पर पड़ने जा रहा है। अब यह तो वर्तमान पर निर्भर करता है कि वह इस पर ध्यान दें। लेकिन जिन लोगों ने भारत के वर्तमान का प्रतिनिधित्व किया ।उनका व्यवहार हमेशा एक खड़ुस पति जैसा रहा। उन्होंने ना तो कभी सुनना चाहा और ना ही इस पर ध्यान दिया ।भारत का वर्तमान कोई आकार लेता इससे पहले ही दीवार पर लिखी इबारत साफ दिखाई दे रही थी ।बल्कि उससे भी पहले जब भारत ने अपने अंग्रेज आकाँओ से वह हासिल किया जिसे वह आजादी मानता है। बेशक, औपनिवेशिक मालिक तो चले गए लेकिन भारत के गरीब तबके के लिए आजादी एक छलावा ही बनी रही।


    1967 की मई की एक गर्मी भरी सुबह पश्चिम बंगाल के अनजान से एक गांव में खेत के पास झाड़ियों में छुप कर बैठे कुछ पुरुषों और महिलाओं को चंद मिनटों के अंदर ही इसका एहसास होने वाला था ।500 वर्ग किलोमीटर में फैला पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी का इलाका तीन पुलिस थानों के अधीन था- नक्सलबाड़ी, खारीबाड़ी और फांसीदेवा। नक्सलबाड़ी का क्षेत्र नेपाल और पूर्वी पाकिस्तान ( बांग्लादेश) से लगा हुआ था। और यहां की आबादी में ज्यादातर आदिवासी थे जो संथाल, ओरावं, मुंडा और राजवंशी समुदायों से आते थे। इनमें से अधिकांश भूमिहीन मजदूर थे। जो जमींदारों के स्वामित्व वाली जमीन पर ठेके पर काम करते थे यह कोई  शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं था। जमींदार इसके एवज में फसल का बहुत बड़ा हिस्सा खुद लेता ।इन खेतों में जानवरों की तरह खटने वाले आदिवासियों को इतना भी नहीं मिलता की वे दो जून की रोटी खा सकें।फसल के बंटवारे को लेकर आए दिन विवाद होते रहते थे।



1960 के दशक के मध्य में भारत गंभीर खाद्य संकट के दौर से गुजर रहा था। खाद्यान्न की कमी से लाखों लोग प्रभावित हुए थे। अनेक भूखमरी के शिकार हो गए सरकार ने हमेशा की तरह यह मानने से इनकार किया कि आजाद भारत में खाने की कमी से किसी की मौत हुई हालात जब बदतर होते चले गए तो दिल्ली में बैठे  नौकरशाहों ने इन मौतों की वजह कुपोषण को बताया ।74 वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद नई दिल्ली कि सरकार का वही पुराना रवैया आज भी कायम है जब भी उड़ीसा या राजस्थान जैसे माओवाद से अछूते क्षेत्र से भी भूख से मौत की खबर आती है तो अधिकारियों की सारी कवायद यह साबित करने के लिए शुरू हो जाती है कि ये मौतें भूख से नहीं बल्कि हैजा, पेचिश के कारण हुए। ना तो यह जानते हैं और ना मानना चाहते हैं कि इन बीमारियों से मौत के शिकार वे ही लोग होते हैं जिनके शरीर खाना ना मिलने से बुरी तरह कमजोर हो गए हैं। चंद्रमा पर मिशन भेजने केेे अभियान से लेकर परमाणु संपन्नन राष्ट्र होने का दम भरने वाला भारत आज तक यह सुनिश्चिित नहीं कर सका है कि कोई भी भूखा ना रहे ।ऐसे मामले देखनेे में आए की अनाज बाहर पड़ा सड़ रहा है और सरकार द्वारा संचालित भारतीय खाद्य निगम के गोदाम शराब बनानेे वाली किसी कंपनी को किराए पर दे दिए गए हैं।

  बहरहाल, 1960 के दशक में देश की खेती योग्य जमीन पर मुट्ठी भर लोगों का मुख्यतः बड़े जमींदारों का कब्जा था ।उन वर्षों के आसपास जमीन की मिल्कियत से संबंधित एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि गावों में 40% जमीन पर महज 5% परिवारों का कब्जा था इसे भी मोटे तौर पर किया गया अनुमान बताया गया था ।भारत के भूमिहीन गरीबों के लिए जिंदगी लगातार एक चुनौती बनी हुई थी और तो और बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्य अकाल की चपेट में आ गए थे।

खाद्य संकट से निपटने के लिए सरकार ने हरित क्रांति की योजना तैयार की और उसे अमली रूप दियाा। इससे भारत के अनाज उत्पादन में वृद्धि तो हुई लेकिन इस हरित क्रांति में समाज में और भी ज्यादा विषमता पैदा की इससे केवल वही किसान लाभान्वित हो सके जो रासायनिक उर्वरक और आधुनिक कृषि उपकरणों को खरीद सकते थे।

सरकार को यह बात समझने में 2 वर्ष का समय लग गया 1969 में राज्य के मुख्यमंत्री का एक सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ जिसमें तत्कालीन गृह मंत्री वाई बी चह्णवाण ने चेतावनी दी कि अगर हरित क्रांति के साथ सामाजिक न्याय के उपायों को नहीं जोड़ा गया तो हो सकता है कि इसकी हरियाली समाप्त हो जाए।

नक्सलबाड़ी में उस तपती मई की सुबह उन पुरुषों और महिलाओं के झाड़ियों में छुपकर बैठने की घटना से काफी पहले से एक व्यक्ति विकास के इस स्वरूप पर बहुत बारीकी से गौर कर रहा था। जिस घटना  मे माओ त्से तुंग केे नेतृत्व मे किसानों की सेना ने पड़ोसीी देेश चीन में संपन्न की थी । यह व्यक्ति माओ के विचारोंं से कहीं बहुत गहरााई तक प्रभावित था। और इसकी पक्की धारणा थी कि लगभग वैसेे स्थीतियां भारत मेंं भी मौजूद है। जिनमें अगर जुझारू किसानो और युवकों को गोलबंद किया जाए तो वह  हथियारबंद संघर्ष के जरिए सरकार का तख्ता पलट सकते हैं ।

अपने नायक माओ त्से तुंग की तरह चारू मजूमदार भी यह मानते थे की युद्ध एक रक्तरंजीत राजनीति के अलावा कुछ नहीं है ।वह खास तौर पर माओ के एक उद्धरण का जिक्र करते थे जिसमें कहा गया था कि "क्रांति कोई डिनर पार्टी नहीं है यह कोई लेख लिखना,चित्रकारी करना या कशीदाकारी करना भी नहीं है इसे विनम्रता, आदर पूर्वक और बहुत सज्जनता के साथ आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। क्रांति एक विद्रोह है एक हिंसात्मक कार्यवाही है जिसके जरिए एक वर्ग दूसरे वर्ग का तख्ता पलट देता है

1965 आते-आते उसने जो भी पढ़ा और सोचा था उसके आधार पर उसके विचारों ने आकार लेना शुरू किया और उत्तरी बंगाल के गांव में चारू मजूमदार की विचारधारा से प्रेरणा लेकर युवकों ने प्रचार का कार्य शुरू किया तथा गरीबों और भूमिहीन किसानों को संगठित करने में लग जाए इससे पहले भारत के कम्युनिस्ट पार्टी सी पी आई ने विभाजन हो चुका था और अपेक्षाकृत ज्यादा रेडिकल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने जन्म ले लिया था लेकिन इस सीपीआई (एम)ने भी ऐसे बहुत सारे कामरेड थे जिनका पार्टी की राजनीति से मोहभंग हो चुका था। और जो यह मानते थे कि उनकी पार्टी संशोधन वादी हो चुकी है इन कामरेडो ने चारू मजूमदार से संपर्क किया। उन्होंने कुछ शर्ते रखी और कहा कि जो उनके साथ शामिल होना चाहते हैं उन्हें चार पूर्व शर्तों को मानना पड़ेगा

1- माओ त्से तुंग को विश्व क्रांति के नेता के रूप में स्वीकार किया जाए और उनके विचारों को उस काल के मार्क्सवाद लेनिनवाद का सर्वोच्च रूप माना जाए।

2- इस दृष्टिकोण को स्वीकार किया जाए कि भारत के हर हिस्से में क्रांतिकारी स्थिति मौजूद है।

3- भारतीय क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए इलाका बार सत्ता दखल ही एकमात्र रास्ता है।

4-  क्रांति को आगे ले जाने के लिए छापामार युद्ध ही एकमात्र साधन है।



चारू मजूमदार की यह पक्की धारणा थी कि ऐसे भूमिगत संगठनों के निर्माण के जरिए ही क्रांति संपन्न की जा सकती है। जो राज्य के खिलाफ युद्ध की शुरुआत करें और उसे आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करें मजदूर संगठनों या किसान संघ हो जैसे "खुले" संगठनों के प्रति उनका नकारात्मक रवैया था उनके समर्थन में उसी इलाके के दो अन्य प्रमुख नेता थे-कानू सान्याल जिनके अंदर जबरदस्त संगठनात्मक कौशल था और जो इलाके के चाय बागान के मजदूरों में बेहद लोकप्रिय थे तथा जंगल संथाल जो एक लोकप्रिय आदिवासी नेता थे जिन्होंने 1967 के चुनाव में हिस्सा लिया था वह चुनाव नहीं जीत पाए थे लेकिन विजई कांग्रेस का उम्मीदवर के बाद सबसे अधिक वोट पाने वाले वही व्यक्ति थे।

इन नेताओं के समर्थन में सीपीआई(एम) ‌ के कुछ कार्यकर्ताओं की मदद लेकर 3 किसानों ने देसी हथियारों को थामा और एक जमीदार के खलिहान से धान की सारी फसल उठा ले गए।

   अगले कुछ महीनों के दौरान कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने जबरन खेतों पर कब्जा किया खलीहाॅनो से अनाज उठाया और जमीन से संबंधित कागजात की होली जलाई अगर किसी ने प्रतिरोध किया तो उसके साथ सख्ती से निपटा गया।

जमींदारों ने फौरन कार्यवाही शुरू की और उन किसानों को जो उनके खेतों पर काम करते थे निकाल बाहर किया। कुछ मामलों में जमीदारों नें पुलिस की मदद ली। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसा सिलसिला था जो लगातार जारी रहा। पुलिस ने अधिकांशत: उन्हीं लोगों के पक्ष में काम किया जो प्रभावशाली और संपन्न थे अथवा जो राजनीतिक तौर पर उनके मालिक थे।

कुछ ही दिनों पूर्व खेतों में काम करने के लिए कुछ किसान गए थे शाम होने पर वह घर नहीं लौटे। अगले दिन कुछ और किसान खेतों में गए और वह भी वापस नहीं लौटे। इसीलिए कुछ पुरुषों और महिलाओं ने झाड़ियों में छुपकर यह जानना चाहा कि माजरा क्या है? जैसे ही किसानों के एक अन्य समूह ने खेत जोतना शुरू किया ।पुलिस का एक दस्ता आया और उन्हें पकड़ कर ले गए। पुलिस वालों से जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जमीदार यह नहीं चाहता है कि वह आदमी उसके खेत पर काम करें और उसने इन लोगों को गिरफ्तार करने को कहा है।इसकी वजह से किसानों के अंदर जबरदस्त गुस्सा पैदा हुआ और तब इन्होंने खुद को भूमिगत दस्तों में संगठित किया जैसा कि चारू मजूमदार के समर्थक चाहते थे।

जल्दी ही एक खूनी युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी जिसने नक्सलबाड़ी को भारत के माओवादी आंदोलन का आधार बनाया और इसे एक नाम भी दिया -नक्सल आंदोलन।


23 मई 1967 इंस्पेक्टर सोनम वांग्दी एक पुलिस दल लेकर पहुंचा ताकि आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार किया जा सके। गुस्से से भरे आदिवासियों के साथ मुठभेड़ हुई और इन आदिवासियों ने तीरों से हमला किया एक तीर‌ वांग्दी को भी लगा और उसकी तत्काल मौत  हो गई।

इसके 2 दिनों बाद पुलिस की और भी बड़ी टोली पहुची पुलिस का मुकाबला करने के लिए इलाके के पुरुषों और महिलाओं ने अपने को एकजुट किया और जो भी हथियार उन्हें मिला उससे वे पुलिस से भीड़ गए ।मुठभेड़ के दौरान आदिवासियों पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें 9 लोग मारे गए इनमें 6 महिलाएं और 2 बच्चे थे।

        अब बाकायदा एक युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी।

                                                      सलाम बस्तर


मुझे चाहिए लाल गलियारा

भारत के जिस हिस्से को आज लाल गलियारा रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है उसके गर्भ में अरबों खरबों डॉलर की खनिज संपदा पड़ी हुई है।
 और यही वह भूभाग भी है जहां भारत के निर्धारित आम(निर्धतम) लोग बसते हैं और अब शायद यही वह इलाका होगा जहां भारत का सबसे हिंसक संघर्ष चलेगा। सरकार ने अपने सैनिकों को यहां भेजा लेकिन वह बहुत कुछ नहीं कर सके। वे करते भी क्या? गांव के भीतर वह कैसे यह जान पातेे कि कौन व्यक्ति माओवादी हैै औ कौन ग्रामीण आदिवासी? अनेक मामलों में वह इस तरह का फर्क करने की जहमत भी नहीं उठाते इसीलिए भोले भाले आदिवासियों को पकड़ लिया जाता है ।उन्हें भीषण यातनाएंं दी जाती हैं उन्हें माओवादी कहा जाता है या तो माओवादी बताकर गोलियोंं से भून दिया जाता है ।इससे समस्याा क समाधान तो नहीं होता बल्कििि विद्रोह में और इजाफा हो जाताा है तथा माओवादियों की संख्या में और भी ज्यादाा वृद्धि हो जाती हैै।

जिससे कथित माओवादियों का सफाया किया जाता है। जिनके बारे में बाद में पता चलता है कि उनमें से अधिकांश निर्दोष आदिवासी थे। सरकार द्वारा नियुक्त विशेष पुलिस अधिकारियों द्वारा आदिवासी महिलाओं का बलात्कार किया जाता है कहीं किसी माओवादी शिविर को उखाड़ फेंका जाता है।
सरकार ने एक आदेश जारी किया कि जो लोग माओवादियों की मदद करते पाए जाएंगे उनके साथ सख्ती से निपटा जाएगा और उनके खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून गैर कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम यू ए पी ए के तहत कार्यवाही की जाएगी।
किसी माओवादी और किसी आदिवासी के बीच का फर्क बहुत धुंधला हो गया है इसीलिए मुमकिन है कि आप जीस आदिवासी को दिन के वक्त जंगल में सुखी टहानियां बटोरते देख रहे हैं उसे रात में बंदूक चलाते नक्सल के रूप में भी देख लें।

राज्य की नीतियों से जो शुन्य पैदा हुआ उसे माओवादी भर रहे है।


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मुझे चाहिए लाल

6 अप्रैल 2010 को मध्य भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के जवानों का एक समूह इलाके में गश्त लगाने के बाद लौट रहा था। उस सुबह एकदम तड़के माओवादियों के एक बड़े दस्ते ने इन जवानों पर हमला बोल दिया।माओवादियों ने छोटे-छोटे समूहों में बैठकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। सैनिकों ने जवाबी हमले किए लेकिन माओवादियों के आगे उनकी चल नहीं सकी देखते-देखते साथ चल रहे स्थानीय पुलिसकर्मी सहित सीआरपीएफ के 75 जवान मारे गए कुछ ही घंटों के अंदर मुठभेड़ की तस्वीरें जो सबसे पहले स्थानीय टेलीविजन चैनल पर दिखाई गई, राष्ट्रीय स्तर पर भी  सभी चैनलों पर दिखाई जा रही थीं।
     जब से यह देश आजाद हुआ उस समय से लेकर अब तक किसी राज्य में विद्रोहियों द्वारा इतने बड़े पैमाने पर किए गए हमले की यह पहली घटना थी कश्मीर में 2 दशकों से आतंकवाद है जिसे एक पड़ोसी देश की भी मदद प्राप्त है। तो भी अकेले किसी एक हमले में वहां भी इतने सुरक्षाकर्मी नहीं मारे गए थेे। माओवादी विद्रोह अपनी उग्रता और क्षमता की वजह से अखबारों की सुर्खियां बनने के मामले में कश्मीर और उत्तर पर्वी राज्यों से आगे निकल चुका थाा।
 अब से कुछ साल पहले तक खबरों की दुनिया से माओवादियों का अस्तित्व गायब था। खबरो मे कश्मीर की ही खूब बिक्री होती थीी। लेकिन अब भारत का हृदय स्थल ही नया कश्मीर बन गया था कुछ ही समय केे भीतर माओवादी विद्रोह लगातार मजबूत ‌‌होता गया और अब इसका विस्तार लगभग आधेेे भारत को अपनेेे दायरे में लेे चुका था छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश।
 माओवादी नेता अब हर जगह थे
पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में एक वरिष्ठ माओवादी नेता मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी लगभग एक मिथक बन चुके थे।
 प्रायः टेलीविजन के पर्दे पर उनकी वह तस्वीर दिख जाती है।जिसमें कैमरे की तरफ उनकी पीठ होती है और कंधे से एक के 56 राइफल लटकती रहती है। अपनेे व्यवहार से वह किसी खतरनाक विद्रोही की बजाय कोई अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर ज्यादा लगते हैं वह धीमी आवाज मेें बोलते हैं और बेहद सामान्य व्यक्ति लगते हैं।
लेकिन, पश्चिम बंगाल में राज्य के खिलाफ आदिवासियों के सशस्त्र विद्रोह  कि उन्होंने महीनों तक व्यक्तिगत तौर पर निगरानी की और एक समय ऐसा भी आया जब पश्चिमी मिदानपुर का समूचाा लालगढ़ इलाका "मुक्त क्षेत्र " के रूप में तब्दील हो गया जहां राज्य का कोई प्राधिकार नहीं था ।और माओवादी ही वहां एक तरह से सरकार चला रहे थे स्थानीय स्थानों पर लाल विद्रोहियोंं का कब्जा हो गया था जिन्होंने सत्तारूढ़ सीपीएम सरकार के कार्यकर्ताओं की क्रूरता से हत्या की।

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Tuesday, 15 December 2020

Wadi-e-Sonebhdra

Wadi-e-Sonebhdra


यदि आप एक भारतीय  नागरिक है तो एक बार उत्तर प्रदेश राज्य के "सोनभद्र" जिले में जरूर आएं यह पर्यटन की दृष्टि से एक ऐसा शहर और स्टेशन है जिसकी गरिमा को देखने के लिए देश-विदेश से व्यक्ति आते हैं।
सोनभद्र जिले को ही एक ऐसा स्थान माना गया है जहां कि लोग आते हैं गुप्तकाशी नामक स्थान का दर्शन करने और यहां एक सोन नदी है जो कि यहां के लोगों के लिए आदिवासियों के लिए जीवनदायिनी है ।
हमारा सोनभद्र ही एक ऐसा पहाड़ की जगह है जहां की विद्युत उत्पादन होता है और यहां से 11 राज्यों के लिए विद्युत आपूर्ति का कार्य किया जाता है और यहां खनिज संपदा जैसे गिट्टी बालू कोयला मोरंग इत्यादि बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
अपना सोनभद्र एक वानस्पतिक दृष्टि से भी अधिक महत्वपूर्ण है और यहां के जंगलों में हिरण भालू भेड़िया जैसे और भी जंगली जानवर रहते हैं।
सोनभद्र के बॉर्डर से लगे हुए ही पर्यटन स्थल राज दरी देव दरी को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
सोनभद्र जिले को ही रार्वटसगंज के नाम से जाना जाता है और इसी जिले में धंधरौल डैम, नगमा डैम ,विजयगढ़ और मारकुंडी इको पॉइंट, हाथीनाला जैसे कई अद्भुत नजारे मिलते हैं देखने के लिए


इको प्वाइंट

अन्नदाता है ये चौकिदार नही !

 


सत्ता गलियारो के हुंकार को कुचलने "किसान" चल पड़ा है ।

ये जो लंगर देख रहो न तुम "नमो" सड़को पर ये आन्दोलन नही

आत्मविश्वास है धरती मां के पुतो‌ का ......कोई अडानी, अम्बानी नही राज कर सकता हमारे देश पर 

यहीं इस लोकतांत्रिक भारत की गरीमा है।

और ये आन्दोलन तुम तो क्या कोई भी नही खत्म कर सकता

उनको डरा रहे हो पानी की बौछार से ,


जो करते हैं "कुल्ला" भी ट्यूबवेल की धार से ,

।।किसान एकता जिन्दाबाद।।


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1857 की क्रांति का इतिहास

  1857 की क्रांति का इतिहास 1857 की क्रांति, जिसे भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश औपन...